नही बना अब तक बिहार में एजुकेशन टिबूनल
- प्राइवेट स्कूलों की मनमानी रोकने के लिए हर स्टेट में बनना था एजुकेशन टिबूनल
- दिल्ली समेत कई राज्य में चल रहे कई सालों से एजुकेशन टिबूनल
संवाददाता, पटना
कभी किसी स्टूडेंट को स्कूल ने निकाल दिया. हफ्ते भर की छुट्टी लेने की सजा जुर्माना और स्कूल से निकाल कर दिया जाता हैं. होमवर्क का पनीशमेंट अक्सर स्टूडेंट्स को भुगतना पड़ता हैं. फिजिकल हेरेसमेंट पर रोक के बावजूद आये दिन टीचर्स पर मारने की बातें सामने आती हैं. स्टूडेंट परीक्षा देते हैं, लेकिन उन्हें स्कूल रिजल्ट नहीं देता हैं. स्कूलों की मनमानी को रोकने के लिए देश भर में एजुकेशन टिबूनल का गठन करने को कहा गया था. 1989 में आये इस फैसले के बाद कई स्टेट गवर्नमेंट ने इसका गठन किया. सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर हर स्टेट में एजुकेशन टिबूनल को बनाया जाना था. देश भर दिल्ली, केरल, तमिलनाडू, आंध्र प्रदेश, हरियाणा, कर्नाटका आदि स्टेट में इसका गठन किया गया हैं. लेकिन बिहार में अभी तक इसका गठन नहीं किया जा सका हैं.
- कहां रखें अपनी बातें, नही हैं अभिभावकों के पास कोई आप्सन
बिहार में किसी भी स्कूल के खिलाफ कोई भी अभिभावक कुछ नहीं बोल पाते हैं. स्कूलों की मनमानी को मानने को तमाम अभिभावक मजबूर हैं. अभिभावकों के उपर स्कूलों की मनमर्जी चलती हैं. स्कूल जो चाहता हैं वो करता हैं. स्कूलों के खिलाफ बाल अधिकार संरक्षण आयोग में स्टूडेंट्स जाते भी हैं, लेकिन आयोग को कोई फैसला लेने को अधिकार नहीं होने से किसी भी मामले का निदान नहीं हो पाता हैं. कई बार स्कूलों के खिलाफ स्टूडेंट्स को हाई कोर्ट तक जाना पड़ता हैं.
- 20 दिनों में होगा फैसला
एजुकेशन टिबूनल में किसी भी केस को 20 दिनों के अंदर साल्व किया जाता हैं. केस दर्ज होने के तुरंत बाद ही उसकी सुनवाई शुरू हो जाती हैं. किसी भी अभिभावक को इसके लिए इंतजार नहीं करना पड़ता हैं. किसी भी केस का निपटारा 20 दिन से लेकर 6 महीने के बीच में कर देना होता है. अभिभावकों को इंतजार नहीं करना पड़ता हैं. अभी तक दिल्ली स्कूल एजुकेशन टिबूनल की बात करें तो पांच हजार के लगभग केस का निपटारा किया जा चुका हैं. दिल्ली स्कूल एजुकेशन टिबूनल की स्थापना 2007 में किया गया था.
- दिल्ली स्कूल एजूकेशन टिबूनल में हर महीने तीन से चार केस
दिल्ली के स्कूलों के खिलाफ आये दिन अभिभावक और शिक्षक एजुकेशन टिबूनल में केस दर्ज करवाते हैं. दिल्ली स्कूल एजुकेशन टिबूनल के मुताबिक हर महीने तीन से चार केस टिबूनल के पास आते हैं. किसी भी केस को महीने भर से अधिक नहीं रखा जाता हैं. महीने भर में इन केसों का फैसला कर लिया जाता हैं. दिल्ली स्कूल एजुकेशन टिबूनल में अधिकांश केस शिक्षा के अधिकार के तहत वाले दर्ज होते हैं. वहीं अगर तमिलनाडू स्टेट की बात करे तो प्राइवेट स्कूल के मनमानी फी लेने पर अधिकांश केस एजुकेशन टिबूनल में दर्ज किये गये हैं.
एजुकेशन टिबूनल का ये है सारा काम
- प्राइवेट स्कूल के फी के अलावा किसी भी गलत तरीके से पैसा लेने के मामले को रोकना
- स्कूल के एफिलिएशन या एनओसी देने की अंतिम मूहर
- सीबीएसइ,आइसीएसइ बोर्ड या किसी भी बोर्ड के मान्यता देने का अंतिम निर्णय लेना
- शिक्षा के अधिकार के तहत हर तरह का फैसला लेना
- स्कूल की मनमर्जी वाले फैसले को रोकना और उसकी तह तक जाना
- स्कूल पर कार्रवाई और एनओसी रोकने का भी अधिकार
- प्राइवेट स्कूल किस केटेरिया के अंतर्गत चलना हैं, इसकी भी जानकारी समय के साथ स्कूल को देना
कोट
एजुकेशन टिबूनल के होने से कई समस्याओं का निदान हो जाता. लेकिन बिहार में इस तरह के संस्था नहीं होने से काफी परेशानी स्टूडेट्स और अभिभावकों को होती हैं. एजुकेशन टिबूनल का गठन होना चाहिए. बिहार में इसकी काफी आवश्यकता हैं.
डीके सिंह, अध्यक्ष, बिहार प्राइवेट चिल्ड्रेन वेलफेयर एसोसिएशन, पटना
एजुकेशन टिबूनल होने से शिक्षकों की समस्याओं का भी निदान होता. प्राइवेट स्कूल की मनमानी पर भी रोक लगती हैं. अभी कई स्कूलों में शिक्षकों की सैलरी आदि पर काफी विवाद होता हैं. इस टिबूनल के होने से स्टूडेट्स और टीचर्स मे सुरक्षा का भावना होता.
निखिल कुमार, महासचिव, डीएवी टीचर्स वेलफेयर एसोसिएशन
- प्राइवेट स्कूलों की मनमानी रोकने के लिए हर स्टेट में बनना था एजुकेशन टिबूनल
- दिल्ली समेत कई राज्य में चल रहे कई सालों से एजुकेशन टिबूनल
संवाददाता, पटना
कभी किसी स्टूडेंट को स्कूल ने निकाल दिया. हफ्ते भर की छुट्टी लेने की सजा जुर्माना और स्कूल से निकाल कर दिया जाता हैं. होमवर्क का पनीशमेंट अक्सर स्टूडेंट्स को भुगतना पड़ता हैं. फिजिकल हेरेसमेंट पर रोक के बावजूद आये दिन टीचर्स पर मारने की बातें सामने आती हैं. स्टूडेंट परीक्षा देते हैं, लेकिन उन्हें स्कूल रिजल्ट नहीं देता हैं. स्कूलों की मनमानी को रोकने के लिए देश भर में एजुकेशन टिबूनल का गठन करने को कहा गया था. 1989 में आये इस फैसले के बाद कई स्टेट गवर्नमेंट ने इसका गठन किया. सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर हर स्टेट में एजुकेशन टिबूनल को बनाया जाना था. देश भर दिल्ली, केरल, तमिलनाडू, आंध्र प्रदेश, हरियाणा, कर्नाटका आदि स्टेट में इसका गठन किया गया हैं. लेकिन बिहार में अभी तक इसका गठन नहीं किया जा सका हैं.
- कहां रखें अपनी बातें, नही हैं अभिभावकों के पास कोई आप्सन
बिहार में किसी भी स्कूल के खिलाफ कोई भी अभिभावक कुछ नहीं बोल पाते हैं. स्कूलों की मनमानी को मानने को तमाम अभिभावक मजबूर हैं. अभिभावकों के उपर स्कूलों की मनमर्जी चलती हैं. स्कूल जो चाहता हैं वो करता हैं. स्कूलों के खिलाफ बाल अधिकार संरक्षण आयोग में स्टूडेंट्स जाते भी हैं, लेकिन आयोग को कोई फैसला लेने को अधिकार नहीं होने से किसी भी मामले का निदान नहीं हो पाता हैं. कई बार स्कूलों के खिलाफ स्टूडेंट्स को हाई कोर्ट तक जाना पड़ता हैं.
- 20 दिनों में होगा फैसला
एजुकेशन टिबूनल में किसी भी केस को 20 दिनों के अंदर साल्व किया जाता हैं. केस दर्ज होने के तुरंत बाद ही उसकी सुनवाई शुरू हो जाती हैं. किसी भी अभिभावक को इसके लिए इंतजार नहीं करना पड़ता हैं. किसी भी केस का निपटारा 20 दिन से लेकर 6 महीने के बीच में कर देना होता है. अभिभावकों को इंतजार नहीं करना पड़ता हैं. अभी तक दिल्ली स्कूल एजुकेशन टिबूनल की बात करें तो पांच हजार के लगभग केस का निपटारा किया जा चुका हैं. दिल्ली स्कूल एजुकेशन टिबूनल की स्थापना 2007 में किया गया था.
- दिल्ली स्कूल एजूकेशन टिबूनल में हर महीने तीन से चार केस
दिल्ली के स्कूलों के खिलाफ आये दिन अभिभावक और शिक्षक एजुकेशन टिबूनल में केस दर्ज करवाते हैं. दिल्ली स्कूल एजुकेशन टिबूनल के मुताबिक हर महीने तीन से चार केस टिबूनल के पास आते हैं. किसी भी केस को महीने भर से अधिक नहीं रखा जाता हैं. महीने भर में इन केसों का फैसला कर लिया जाता हैं. दिल्ली स्कूल एजुकेशन टिबूनल में अधिकांश केस शिक्षा के अधिकार के तहत वाले दर्ज होते हैं. वहीं अगर तमिलनाडू स्टेट की बात करे तो प्राइवेट स्कूल के मनमानी फी लेने पर अधिकांश केस एजुकेशन टिबूनल में दर्ज किये गये हैं.
एजुकेशन टिबूनल का ये है सारा काम
- प्राइवेट स्कूल के फी के अलावा किसी भी गलत तरीके से पैसा लेने के मामले को रोकना
- स्कूल के एफिलिएशन या एनओसी देने की अंतिम मूहर
- सीबीएसइ,आइसीएसइ बोर्ड या किसी भी बोर्ड के मान्यता देने का अंतिम निर्णय लेना
- शिक्षा के अधिकार के तहत हर तरह का फैसला लेना
- स्कूल की मनमर्जी वाले फैसले को रोकना और उसकी तह तक जाना
- स्कूल पर कार्रवाई और एनओसी रोकने का भी अधिकार
- प्राइवेट स्कूल किस केटेरिया के अंतर्गत चलना हैं, इसकी भी जानकारी समय के साथ स्कूल को देना
कोट
एजुकेशन टिबूनल के होने से कई समस्याओं का निदान हो जाता. लेकिन बिहार में इस तरह के संस्था नहीं होने से काफी परेशानी स्टूडेट्स और अभिभावकों को होती हैं. एजुकेशन टिबूनल का गठन होना चाहिए. बिहार में इसकी काफी आवश्यकता हैं.
डीके सिंह, अध्यक्ष, बिहार प्राइवेट चिल्ड्रेन वेलफेयर एसोसिएशन, पटना
एजुकेशन टिबूनल होने से शिक्षकों की समस्याओं का भी निदान होता. प्राइवेट स्कूल की मनमानी पर भी रोक लगती हैं. अभी कई स्कूलों में शिक्षकों की सैलरी आदि पर काफी विवाद होता हैं. इस टिबूनल के होने से स्टूडेट्स और टीचर्स मे सुरक्षा का भावना होता.
निखिल कुमार, महासचिव, डीएवी टीचर्स वेलफेयर एसोसिएशन
No comments:
Post a Comment