Friday, June 5, 2015

डीएम साहब, इनकी सुरक्षा की भी जिम्मेवारी आपकी ही है

डीएम साहब, इनकी सुरक्षा की भी जिम्मेवारी आपकी ही है

- स्कूल की मनमानी पर जिला प्रशासन ने लगायी चूप्पी
- सेक्यूरिटी कॉडिनेशन कमिटी की 2013 मार्च के बाद नहीं हुई बैठक
संवाददाता, पटना
स्कूल के अंदर स्टूडेंट की जिम्मेवारी स्कूल प्रशासन की तो स्कूल के बाहर सड़क पर स्टूडेंट्स की सुरक्षा की जिम्मेवारी जिला प्रशासन पर होगी. इसके लिए चार साल पहले कई नियम भी बनाये गये, लेकिन वर्तमान में ये सारे नियम ताक पर हैं. स्कूल की ओर से मनमानी रूकने का नाम नहीं ले रहा है. इस मनमानी पर कोई रोक लगाने वाला भी नहीं है. डीएम साहब, आपके उपर ही पूरे शहर की जिम्मेवारी होती है. हर जिम्मेवारी निभाते हुए आपकी यह भी जिम्मेवारी है कि शहर में जब एक लाख के लगभग बच्चे स्कूल जाते हैं तो उनकी सुरक्षा भी आपके ही जिम्मे है. स्कूल के बाहर हो या स्कूल के अंदर, शहर के बच्चे ना तो आर्थिक रूप से सुरक्षित है और ना ही सामाजिक रूप से. अब आप देखिये आपके सामने स्कूल अपनी मनमरजी कर रहा है, लेकिन आपका ध्यान इस ओर नहीं जाता हैं.

- हर साल बदल जाता है यूनिफार्म
स्कूल का यूनिफार्म कब बदला जायें, इसका कोई नियम नहीं है . कई स्कूल तो हर साल अपने यहां यूनिफार्म में चेंज देते है. इसका अतिरिक्त बोझ अभिभावकों के उपर पड़ता है. इतना ही नहीं, कई स्कूल तो हफ्ते में चार से पांच यूनिफार्म तक चलाते है. ऐसे में साल में एक बार भी यूनिफार्म चेंज होता है तो अभिभावकों को नुकसान होता है. स्कूल द्वारा यूनिफार्म चेंज करने पर कोई लगाम नहीं है. इतना ही नही कई स्कूल तो साल के बीच मे भी नये यूनिफार्म की शुरुआत कर देते है. इससे अतिरिक्त बोझ अभिभावकों के उपर पड़ता रहता है.
- फी पर नहीं है कोई कंट्रोल
पटना के स्कूलों पर फी बढ़ोतरी का कोई लगाम नही हैं.  हर स्कूल अपनी मरजी से फी में बढ़ोतरी करता हैं. हर साल अधिकांश 5 परसेंट तक फी की बढ़ोतरी होनी चाहिए. लेकिन ऐसा होता नहीं है. हर स्कूल अपनी मरजी से 15 से 20 फीसदी तक फी में बढ़ोतरी करते है. इसके पीछे स्कूल वाले टीचर्स की सैलरी बढ़ाने का तर्क भी देते है. लेकिन ना तो टीचर्स की सैलरी बढ़ती है और फी का मनमाना बोझ अभिभावकों को देना होता है. स्कूलों पर फी का कोई कंट्रोल नही हैं.
- रि-एडमिशन के नाम पर मोटी रकम
नये सेशन की शुरुआत होने पर हर स्टूडेट को दूसरे क्लास में जाने के लिए रि-एडमिशन करवाना होता है. हर स्कूल रि-एडमिशन के नाम पर मोटी रकम वसूलता है. कोई डायरेक्ट रि-एडमिशन के नाम पर फी लेता है तो कोई दूसरे मद पर लेकर रि-एडमिशन फी की अपनी शर्त को पूरा करता है. नये सत्र की शुरुआत में 20 से 30 हजार रुपये हर बच्चो से ली जाती है. इतना ही नहीं दो महीने के गर्मी की छुट्टी का फी भी स्कूल वाले लेते है . इस छुट्टी में लाइब्रेरी फी से लेकर लैब फी भी वसूला जाता है. बच्चे स्कूल जायें या ना जायें, लेकिन गर्मी छुट्टी के बस की फी भी उन्हें दे देना होता हैं.
- बिना रसीद के लेते है पैसे
ट्यूशन फी के अलावा हर महीने अभिभावकों से कई मदों के नाम पर स्कूल वाले पैसे वसूलते है. इसके लिए अभिभावको को कोई रसीद भी नहीं दिया जाता है. ऐसे में अभिभावक चाहते हुए भी कोई विरोध नहीं कर पाते है. अभिभावको की माने तो हर महीने पैसे के अलग-अलग डिमांड होते है. स्कूल से विरोध करने पर बच्चे को स्कूल से निकाल देने की धमकी तक मिल जाता है. कई बार स्कूल की ओर से ब्लैकमेलिंग भी किया जाता है. इसमें भी कई अभिभावक फंस जाते है. पटना के कई स्कूल किसी सोसायटी के जुड़ा हुआ है. इस सोसायटी के नाम पर भी स्टूडेंट से पैसे लिये जाते है.
- बसों और ऑटो का नियम ताक पर
हर स्कूल को निर्देश दिया गया था कि स्कूल की छुट्टी के समय हर पांच मिनट के गैप पर स्कूल से बसें निकलेगी. इससे बच्चे जाम में नहीं फसेंगे. जितनी सीटें उतने बच्चे को ही स्कूल की बसें, ऑटो और स्कूली वैन में ही बैठाया जायें. कई सालों पहले बना यह नियम वर्तमान में बिलकुल ही फेल है. ऑटों में बच्चे ठूसे जाते हैं. स्कूलों बसों में जिन नियमों का पालन करने को कहा गया था. उसमें से कोई नहीं हो रहा है. बस के ड्राइवर को स्कूल की ओर से आइकार्ड देना था. बस के बाहर के बॉडी पर स्कूल का नाम, लोकल थाने का नाम के साथ टेलीफोन नंबर आदि अंकित होना आवश्यक है. हर स्कूल के बस की जांच रेगूलर होना तय किया गया था. लेकिन यह सारे नियम अब ठंडे बस्ते में जा चुका है. बच्चे स्कूल बस की फी तो भरते है लेकिन उन्हें सुविधा के नाम पर कुछ नहीं मिलता है.
- क्यूं खुलता है सड़क पर स्कूल का गेट
सीबीएसइ और आइसीएसइ बोर्ड के अनुसार स्कूल के बस का गेट बच्चे के उतरने वाले स्टॉपेज पर ही खुलना तय किया गया है. बच्चे के सुरक्षा को ध्यान में रख कर इस नियम को बनाया गया था. लेकिन पटना में चलने वाले अधिकांश बसें के गेट खुले होते है. बच्चों को कहीं पर भी उतार दिया जाता है. कंडक्टर इस बात का ख्याल नहीं रखते कि बच्चे को सुरक्षित जगह पर उतारे. अधिकांश स्कूलों बसे अपने स्पीड (20 किलोमीटर से अधिक नहीं होना चाहिए) का भी ख्याल नहीं रखते है. ओवर टेक करना तो स्कूलों बसों का नियम बन गया है. इससे बस मे बैठे बच्चों को कई कठिनाई का सामना करना पड़ता है.
- सेक्यूरिटी कॉडिनेशन कमिटी भी गया ठंडे बस्ते में
कई स्कूली बच्चों के अपहरण की घटना के बाद लोकल लेवल पर सेक्यूरिटी कॉडिनेशन कमिटी (सुरक्षा सवन्यव समिति) का गठन किया गया था. मार्च 2012 में बने इस कमिटी की पहली बैठक की अध्यक्षता तात्कालिन आइजी राजबर्धन शर्मा ने किया था. इस कमिटी के अध्यक्ष स्थानीय डीएम और एसएसपी होते हैं. बैठक में डीएम, ट्रैफिक पुलिस, एसएसपी, एसपी, स्कूल के प्रिंसिपल, स्कूल एसोसिएशन से जुड़े लोग शामिल होते थे. बैठक के माध्यम से स्कूल कैंपस और स्कूल के बाहर बच्चों को कैसे सुरक्षित रखा जायें, इस पर विचार किया जाता था. हर किसी को उनकी जिम्मेवारी बतायी जाती थी. कमिटी की बैठक जरूरत के अनुसार महीने मे एक बार या फिर दो महीने पर एक बार करना तय किया गया था. 2012 में तो इसे पूरा फॉलो किया गया. लेकिन 2013 मार्च के बाद यह बैठक आज तक नही हो पायी है. लगभग तीन साल बीत चुके है, लेकिन इसकी बैठक अभी तक नहीं किया गया हैं.
- नहीं लगा है सीसी टीवी कैमरा
स्कूलों में अभी तक सीसी टीवी कैमरा नहीं लगा है. कई सालों पहले बने इस नियम के तहत हर स्कूल को सुरक्षा के मददे नजर स्कूल के मेन गेट, खेल के मैदान, सीढ़ी, क्लास रूम, स्टॉफ रूम आदि में सीसी टीवी कैमरा लगाना तय किया गया था. इससे स्कूल परिसर में किसी भी घटना की जानकारी स्कूल के प्रधान को तुरंत मिल जाती. लेकिन इसका भी पालन अधिकांश स्कूलों में नहीं हुआ हैं. स्कूल के मेन गेट पर सीसी टीवी आज भी नहीं लगा है. अगर किसी तरह की घटना होती है तो स्कूल प्रशासन के अलावा जिला प्रशासन को भी कोई जानकारी नहीं मिलेगी.
- स्कूल का सारा डिटेल्स होना चाहिए था लोकल थाना
हर स्कूल अपने लोकल थाना से जुड़ा रहेगा. स्कूल से संबंधित सारी जानकारी उस लोकल थाना के पास होनी चाहिए. स्कूल के टेलीफोन नंबर के साथ तमाम टीचर्स का नंबर भी लोकल थाना में होना चाहिए. इसके अलावा तमाम स्कूल मेन पुलिस हेडक्वाटर से भी जुड़ा होना चाहिए. इससे किसी भी घटना पर आसानी से कार्रवाई की जा सकेगी. लेकिन कुछ स्कूलों को छोड़ दे तो अधिकांश स्कूल लोकल थाने के पास कोई डिटेल्स नहीं भेजा है. ऐसे में बच्चे के सुरक्षा पर प्रश्न चिन्ह लगा हुआ है.
- जब देखों स्कूल निकाल देता है स्टूडेंट को
डीएवी बीएसइबी ने 12वीं की स्टूडेंट प्रिया राय को स्कूल से निकाल दिया. सेट जेवियर ने 9वीं में तुषार को स्कूल से निकाल दिया. एवीएन इंगलिश स्कूल ने 388 स्टूडेंट्स का भविष्य दावं पर लगा दिया. अब इन स्टूडेंट्स का भविष्य बर्बाद हो गया. इनके साल दो साल का कॅरियर बर्बाद हो गया, लेकिन इसकी जिम्मेवारी कौन लेगा. स्कूल जब चाहे किसी भी स्टूडेंट को स्कूल से निकाल देता है. इसके बाद स्टूडेंट स्कूल से गुहार लगाता रहता है, लेकिन उन्हें स्कूल मे ंनहीं रखा जाता है. कई बार छात्र हाई कोट का दरवाजा भी खटखटाते है, लेकिन इसका भी कोई फायदा नहीं होता हैं.

कोट
जब सेक्यूरिटी कॉडिनेशन कमिटी का गठन किया गया था तो एक साल तक हर महीने और दो महीने पर बैठक होती थी. लेकिन 2013 के मार्च के बाद एक भी बैठक नहीं हुई हैं . इस बैठक से पदाधिकारी से लेकर स्कूल प्रशासन तक बच्चों के सुरक्षा को लेकर खुद की जिम्मेवारी समझते थे. कई बार तात्कालिन डीएम को हमने लिख कर भी दिया. लेकिन कुछ नही हुआ. पिछले दो सालों से तो एक भी बैठक नहीं हुई है.
डीके सिंह, अध्यक्ष, बिहार राज्य चिल्ड्रेन वेलफेयर एसोसिएशन 

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