Thursday, April 23, 2015

आरटीइ में एडमिशन तो मिल गया, बांकी का खर्च कैसे उठायें

आरटीइ में एडमिशन तो मिल गया, बांकी का खर्च कैसे उठायें

- आरटीइ के तहत एडमिशन लेने वाले छात्रों पर बढ़ रहा आर्थिक बोझ
- फीस की जगह एक्स्ट्रा एक्टिविटीज के नाम पर ले लिये जाते है हजारों रुपये
संवाददाता, पटना
केस वन  - रोहित (बदला हुआ नाम) का एडमिशन शिक्षा के अधिकार के तहत दो साल पहले पटना के एक स्कूल में किया गया. रोहित के अभिभावक को हर दो महीने पर हजार रुपये देना होता है. इसे तो जैसे तैसे रोहित के अभिभावक जमा कर भी देते है. लेकिन अभी नये सत्र की शुरुआत में रोहित को स्कूल के बुक्स के लिस्ट के साथ यूनिफार्म भी लेने को कहा गया है. इस पर पूरा खर्च करने में रोहित के अभिभावक असमर्थ है. अब रोहित के अभिभावक ने बाल अधिकार संरक्षण आयोग का दरवाजा खटखटाया है.
यह कहानी किसी एक रोहित की नहीं है बल्कि कई अभिभावक स्कूल के द्वारा मांगे जा रहे किसी दूसरे मद के चार्ज से परेशान है. सीबीएसइ स्कूलों की मनमानी अभी तक आम अभिभावक ही ङोल रहे है, लेकिन अब इसका असर उन अभिभावकों को महसूस होने लगा है जिनके बच्चे का एडमिशन शिक्षा के अधिकार कानून के तहत लिया गया है. स्कूल वालों को इस अधिकार के तहत नामांकन लेने वाले बच्चों का फी तो सरकर की ओर से दे दिया जाता है, लेकिन एक्स्ट्रा खर्च का बोझ इन अभिभावकों को समय-समय पर करना पड़ता है. अब तो ये मामले बाल अधिकार संरक्षण आयोग तक पहुंच रहे है. लेकिन आयोग इसमें कुछ भी नहीं कर पा रहा
- निशुल्क शिक्षा के बाद भी इतना खर्च
आरटीइ से एडमिशन लेने वाले बच्चे को टयूशन फी भले ही स्कूल नहीं ले रहे, लेकिन अन्य खर्च पर नजर डाली जायें तो एक तरह से इसका खर्च हजारों में जा रहा है. आरटीइ के तहत पढ़ने वाले छात्रों के लिए ज्यादातर स्कूलों में    कई सुविधा लेना अनिवार्य कर रखा है. एडमिशन के समय कम से कम 4 हजार रूपये की किताब कॉपी,  500 सौ रुपये की ड्रेसेस, साल भर में होने वाले एक्टिविटीज के करीब 1000 रुपये लिये जा रहे है. इस तरह निशुल्क शिक्षा के बाद भी जरूरतमंद परिवारों की साल भर के करीब हजारों रूपये खर्च हो जा रहे है. अब इस खर्च को वहन करना अभिभावकों के लिए मुश्किलें पैदा कर रहा है.
हर दो महीने में एक्टिविटी
कई स्कूल ऐसे है जहां पर हर दिन कुछ ना कुछ एक्टिविटी करवायी जाती है. इन एक्टिविटी में शामिल होना हर बच्चों के लिए अनिवार्य है. ऐसे में अभिभावकों की मजबूरी है कि उन्हें ना चाहते हुए भी एक्टिविटी में बच्चों को शामिल करें. इसके लिए उन्हें कई बार पैसे भी देने होते है. सीबीएसइ के अनुसार अब हर स्कूल एक्टिविटी पर अधिक फोकस करता है. ऐसे में हर अभिभावकों को स्कूल फी के अलावा 400 से 500 रुपये हर महीने देना होता है. इंटरनेशनल स्कूल की प्रिंसिपल एफ हसन ने बताया कि स्कूल में कोई एक्टिविटी हर छात्र के लिए होता है. ऐसे में 25 परसेंट आरटीइ छात्र को अलग हटा कर तो नही किया जा सकता है. और एक बार की बात तो है नहीं जो स्कूल अपनी ओर से एक्टिविटी पर पैसे खर्च करेगा.
- शिक्षा का अधिकार कानून में कमियां ही कमियां
छह से 14 वर्ष के बच्चों को निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार कानून लागू करने में पिछले तीन सालों के दौरान पूरे देश में कुल 1.13 लाख करोड़ रुपये खर्च किये गये. लेकिन इसमें कमियां बरकरार है. स्कूलों में शिक्षकों की उपलब्धता, वंचित वर्ग के बच्चों के लिए 25 फीसदी सीट आरक्षित करने जैसे मुददे अभी तक पूरे नहीं किये जा सके.  नये सत्र के लिए प्राइवेट स्कूलों में नामांकन की प्रक्रिया चल रही है. आरटीइ के तहत अब फी का ब्योरा देना हर स्कूलों के लिए अनिवार्य है. जानकारी के अनुसार आरटीइ के तहत राज्य सरकार की ओर से हर बच्चों के लिए  साल में 4200 सौ रुपये दिये जाते है. लेकिन ये पैसे भी स्कूल को समय पर नहीं मिल पा रहा है. ऐसे में स्कूल को ही सारा कुछ वहन करना पड़ता है.
इन चीजों पर लिया जाता है एक्स्ट्रा चाजर्
- एक्टिविटी के नाम पर
- साइंस एग्जीविशन के नाम पर
- प्रोजेक्ट वर्क के नाम पर
- स्कूल डेवलपमेंट के नाम पर
- एनूअल स्पोर्टस डे के नाम पर
- कंप्यूटर एजूकेशन के नाम पर
- साइंस और लैग्वेज लैब के नाम पर

कोट
सरकारी स्कूलों में छात्रों पर हर महीने सरकार हजारों रुपये खर्च करती है. लेकिन प्राइवेट स्कूलों में साल में 4200 सौ रूपये देकर सरकार भूल जाती है. ऐसे में एक प्राइवेट स्कूल अपने घर से तो पैसे लगा कर  तो 25 परसेंट बच्चों को नहीं पढ़ायेगा. स्कूल में कई तरह के खर्च होते है. सारा कुछ स्कूल तो नहीं कर सकता है. इसके लिए या तो सरकार करें या फिर अभिभावकों को करना पड़ेगा.
शमायल अहमद, प्राइवेट स्कूल टीचर्स एसोसिएशन

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