नारी गुंजन सरगम बैंड ने बदल दी इनकी जिंदगी
- दानापुर स्थिति ढीबरा गांव की 12 महिलाओं ने तैयार किया अपना बैंड
- पटना के कई जगहों पर दे चुकी हैं परफार्मेस
- घरेलू हिंसा के खिलाफ भी उतारती है बैंड
संवाददाता, पटना
कहानी एक - 25 साल की छठिया देवी खेत में मजदूरी का काम करती है. संगीत से उसे लगाव था. अपनी सहेली के साथ बैंड पाटी में शामिल हो गयी. पति ने विरोध किया. बैंड में शामिल होने के कारण पति उसे बहुत पीटा भी. छठिया देवी ने बताया कि वो कहता था कि खाली नगाड़ा पीटने से पेट नहीं भर जायेगा. लेकिन हमने ड्रम बजाना सीखा. जब पहली बार कमाई हुई तो पति को जाकर दिया तो वो शांत हुआ.
कहानी दो - सावित्री देवी की उम्र 60 साल है. जिस उम्र में लोग काम से रिटायर होते है. उस उम्र में सावित्री देवी ने ड्रम बजाना सीखा. लोग ताने मारते थे कि इतनी उम्र में कोई कुछ सीख नहीं सकता है. लेकिन सावित्री देवी ने कोशिश नहीं छोड़ी. आज सावित्री देवी ड्रम बजाते हुए झट से धुन को पकड़ लेती हैं.
यह कहानी कोई एक 60 साल की सावित्री देवी और 25 साल की छठिया देवी का नहीं है. बल्कि इसमें 12 महिलाएं शामिल है जिन्होंने अपने जाति और लिंग को दरकिनार कर अपने सपने को पूरा कर रही है. हाशिये पर पड़ी इन महादलित महिलाओं ने अपना एक म्यूजिकल बैंड तैयार किया है. नारी गुंजन म्यूजिकल बैंड नाम का यह बैंड महिलाओं को सशक्त करने के साथ उन्हें आत्मनिर्भर भी बना रहा है. ये महिलाएं अपने बैंड के साथ पटना और आसपास के इलाकों में स्टेज परफार्मेस भी दे चुकी है. बैंड की एक महिला सविता देवी ने बताया कि अभी तक 20 से 25 जगहों पर स्टेज पर जाकर कार्यक्रम कर चुकी हूं.
- खेत से स्टेज तक का सफर
आज ये महिलाएं स्टेज पर जब ड्रम बजाती है तो देखकर कोई नहीं कह सकता कि ये ख्ेातों में मजदूरी का काम करती है. खेत से स्टेज तक का यह सफर इन महिलाओं के लिए आसान नहीं था. उनकी इस कोशिश अमलीजामा देने का काम नारी गुंजन संस्थान की फाउंडर सुधा वर्गीज ने दिया है. पद्मश्री सुधा वर्गीज ने दानापुर स्थिति ढीबरा गांव में कुछ महादलित महिलाओं को इकट्ठा किया. अगस्त 2012 से इसकी शुरुआत हुई. इसके लिए शुरू में 16 महादलित महिलाओं को चुना गया. खेतों में काम कर रहीं इन महिलाओं को रोजगार से जोड़ने को लेकर पहले इन्हें ट्रेनिंग दी गयी. उसके बाद 16 में से 12 महिलाओं का चयन कर म्यूजिकल बैंड तैयार किया गया. बैंड की एक सदस्य अनिता देवी ने बताया कि रोज एक घंटे तक का ट्रेनिंग करते थे. छह महीने तक हमें दिक्कतें होती रही. हम धुन नहीं पकड़ पाते थे. लेकिन बाद में सब ठीक हो गया. 30 साल की लालती देवी ने बताया खेत में मजदूरी कर हम स्टेज पर भी कार्यक्रम करते हैं.
- मुख्यमंत्री के पास भी कर चुकी कार्यक्रम
हिंदी गाने हो या भोजपुरी या फिर स्थानीय मगही भाषा हर गाने के धुन पर ये महिलाएं ड्रम आसानी से बजा लेती है. तभी तो अभी तक मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के यहां भी कई बार इनका कार्यक्रम हो चुका है. 35 साल की वैजयंती देवी ने बताया कि मुख्यमंत्री ने कई बार अपने यहां पर कार्यक्रम के लिए बुलाया है. पटना और इसके आसपास के क्षेत्र में कई बार कार्यक्रम आयोजित हुआ है. इसके अलावा गया में भी हम एक बार म्यूजिकल बैंड टीम के साथ कार्यक्रम कर चुके है.
- खेत की मजदूरी में 100 और ड्रम बजाने पर मिलता है 5 सौ
खेतों पर घंटों काम करने पर जहां इन महिलाओं को 100 रुपय की मजदूरी के तौर पर मिलता है वहीं बैंड का हिस्सा बनने के बाद एक कार्यक्रम से इन्हें 5 सौ रुपये की आमदनी हो जाती है. बैंड की सदस्य मानती देवी ने बताया कि खेत पर मजदूरी करने का समय निश्चित नहीं है. घंटों हमे काम करना पड़ता है. इसके बदले हमें 100 रुपये मिलते है. लेकिन ड्रम बजाने पर 5 सौ रुपये मिलते है.
- आदमी औरत को पीटता है तो उसकी बैंड बजा देती हूं
महिलाओं का यह बैंड ना सिर्फ लोगों का मनोरंजन करता है बल्कि उसी ताकत से औरतों के हक की आवाज भी उठाता है. 35 साल की बेदामी देवी ने बताया कि राम में भी अगर कोई आदमी अपनी औरत को पीटता है तो हमारी बैंड की तमाम महिलाएं इकट्ठा होकर उस आदमी की बैंड बजाते है. हमारी बैंड पाटी उसके यहां धावा बोल देती है. इससे घरों में महिलाएं सुरक्षित भी हुई है. पीटने की घटना अब नहीं के बराबर होती है.
कोट
ये पढ़ी लिखी नहीं है. इन्होंने हिंदी या इंगलिश वर्णमाला का अक्षर तक नहीं देखा है. खेतों में मजदूरी कर ये अपना और अपने परिवार का पेट पालती है. लेकिन संगीत का इन्होंने अपने जीवन में ऐसा रंग डाला कि नीरस भरी जिंदगी संवर सी गयी. जी हां, पटना से सटे दानापुर स्थित ढीबरा गांव में
सुधा वर्गीज, नारी गुंजन संस्थान
शुरुआत में महिलाओं को कई तरह की परेशानी का सामना करना पड़ा. परिवार की ओर से सहमति नहीं मिली. लेकिन बाद में धीरे-धीरे बैंड के लिए 12 महादलित महिलाओं को शामिल किया गया. अभी तक महिलाएं घरों में कैद रहती थी. लेकिन अब वो आत्म निर्भर हो चुकी है. इन महिलाओं ने यह साबित कर दिया कि जो काम पुरूष कर सकते है वो महिलाएं भी कर सकती हैं. संगीत की एबीसी नहीं जानती ये महिलाएं आज संगीत के धुन को आसानी से पकड़ रही हैं.
राजू, प्रोग्राम को-ऑडिनेटर, नारी गुंजन म्यूजिकल बैंड
1 jan. 2015 on prabhat khabar, patna
- दानापुर स्थिति ढीबरा गांव की 12 महिलाओं ने तैयार किया अपना बैंड
- पटना के कई जगहों पर दे चुकी हैं परफार्मेस
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संवाददाता, पटना
कहानी एक - 25 साल की छठिया देवी खेत में मजदूरी का काम करती है. संगीत से उसे लगाव था. अपनी सहेली के साथ बैंड पाटी में शामिल हो गयी. पति ने विरोध किया. बैंड में शामिल होने के कारण पति उसे बहुत पीटा भी. छठिया देवी ने बताया कि वो कहता था कि खाली नगाड़ा पीटने से पेट नहीं भर जायेगा. लेकिन हमने ड्रम बजाना सीखा. जब पहली बार कमाई हुई तो पति को जाकर दिया तो वो शांत हुआ.
कहानी दो - सावित्री देवी की उम्र 60 साल है. जिस उम्र में लोग काम से रिटायर होते है. उस उम्र में सावित्री देवी ने ड्रम बजाना सीखा. लोग ताने मारते थे कि इतनी उम्र में कोई कुछ सीख नहीं सकता है. लेकिन सावित्री देवी ने कोशिश नहीं छोड़ी. आज सावित्री देवी ड्रम बजाते हुए झट से धुन को पकड़ लेती हैं.
यह कहानी कोई एक 60 साल की सावित्री देवी और 25 साल की छठिया देवी का नहीं है. बल्कि इसमें 12 महिलाएं शामिल है जिन्होंने अपने जाति और लिंग को दरकिनार कर अपने सपने को पूरा कर रही है. हाशिये पर पड़ी इन महादलित महिलाओं ने अपना एक म्यूजिकल बैंड तैयार किया है. नारी गुंजन म्यूजिकल बैंड नाम का यह बैंड महिलाओं को सशक्त करने के साथ उन्हें आत्मनिर्भर भी बना रहा है. ये महिलाएं अपने बैंड के साथ पटना और आसपास के इलाकों में स्टेज परफार्मेस भी दे चुकी है. बैंड की एक महिला सविता देवी ने बताया कि अभी तक 20 से 25 जगहों पर स्टेज पर जाकर कार्यक्रम कर चुकी हूं.
- खेत से स्टेज तक का सफर
आज ये महिलाएं स्टेज पर जब ड्रम बजाती है तो देखकर कोई नहीं कह सकता कि ये ख्ेातों में मजदूरी का काम करती है. खेत से स्टेज तक का यह सफर इन महिलाओं के लिए आसान नहीं था. उनकी इस कोशिश अमलीजामा देने का काम नारी गुंजन संस्थान की फाउंडर सुधा वर्गीज ने दिया है. पद्मश्री सुधा वर्गीज ने दानापुर स्थिति ढीबरा गांव में कुछ महादलित महिलाओं को इकट्ठा किया. अगस्त 2012 से इसकी शुरुआत हुई. इसके लिए शुरू में 16 महादलित महिलाओं को चुना गया. खेतों में काम कर रहीं इन महिलाओं को रोजगार से जोड़ने को लेकर पहले इन्हें ट्रेनिंग दी गयी. उसके बाद 16 में से 12 महिलाओं का चयन कर म्यूजिकल बैंड तैयार किया गया. बैंड की एक सदस्य अनिता देवी ने बताया कि रोज एक घंटे तक का ट्रेनिंग करते थे. छह महीने तक हमें दिक्कतें होती रही. हम धुन नहीं पकड़ पाते थे. लेकिन बाद में सब ठीक हो गया. 30 साल की लालती देवी ने बताया खेत में मजदूरी कर हम स्टेज पर भी कार्यक्रम करते हैं.
- मुख्यमंत्री के पास भी कर चुकी कार्यक्रम
हिंदी गाने हो या भोजपुरी या फिर स्थानीय मगही भाषा हर गाने के धुन पर ये महिलाएं ड्रम आसानी से बजा लेती है. तभी तो अभी तक मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के यहां भी कई बार इनका कार्यक्रम हो चुका है. 35 साल की वैजयंती देवी ने बताया कि मुख्यमंत्री ने कई बार अपने यहां पर कार्यक्रम के लिए बुलाया है. पटना और इसके आसपास के क्षेत्र में कई बार कार्यक्रम आयोजित हुआ है. इसके अलावा गया में भी हम एक बार म्यूजिकल बैंड टीम के साथ कार्यक्रम कर चुके है.
- खेत की मजदूरी में 100 और ड्रम बजाने पर मिलता है 5 सौ
खेतों पर घंटों काम करने पर जहां इन महिलाओं को 100 रुपय की मजदूरी के तौर पर मिलता है वहीं बैंड का हिस्सा बनने के बाद एक कार्यक्रम से इन्हें 5 सौ रुपये की आमदनी हो जाती है. बैंड की सदस्य मानती देवी ने बताया कि खेत पर मजदूरी करने का समय निश्चित नहीं है. घंटों हमे काम करना पड़ता है. इसके बदले हमें 100 रुपये मिलते है. लेकिन ड्रम बजाने पर 5 सौ रुपये मिलते है.
- आदमी औरत को पीटता है तो उसकी बैंड बजा देती हूं
महिलाओं का यह बैंड ना सिर्फ लोगों का मनोरंजन करता है बल्कि उसी ताकत से औरतों के हक की आवाज भी उठाता है. 35 साल की बेदामी देवी ने बताया कि राम में भी अगर कोई आदमी अपनी औरत को पीटता है तो हमारी बैंड की तमाम महिलाएं इकट्ठा होकर उस आदमी की बैंड बजाते है. हमारी बैंड पाटी उसके यहां धावा बोल देती है. इससे घरों में महिलाएं सुरक्षित भी हुई है. पीटने की घटना अब नहीं के बराबर होती है.
कोट
ये पढ़ी लिखी नहीं है. इन्होंने हिंदी या इंगलिश वर्णमाला का अक्षर तक नहीं देखा है. खेतों में मजदूरी कर ये अपना और अपने परिवार का पेट पालती है. लेकिन संगीत का इन्होंने अपने जीवन में ऐसा रंग डाला कि नीरस भरी जिंदगी संवर सी गयी. जी हां, पटना से सटे दानापुर स्थित ढीबरा गांव में
सुधा वर्गीज, नारी गुंजन संस्थान
शुरुआत में महिलाओं को कई तरह की परेशानी का सामना करना पड़ा. परिवार की ओर से सहमति नहीं मिली. लेकिन बाद में धीरे-धीरे बैंड के लिए 12 महादलित महिलाओं को शामिल किया गया. अभी तक महिलाएं घरों में कैद रहती थी. लेकिन अब वो आत्म निर्भर हो चुकी है. इन महिलाओं ने यह साबित कर दिया कि जो काम पुरूष कर सकते है वो महिलाएं भी कर सकती हैं. संगीत की एबीसी नहीं जानती ये महिलाएं आज संगीत के धुन को आसानी से पकड़ रही हैं.
राजू, प्रोग्राम को-ऑडिनेटर, नारी गुंजन म्यूजिकल बैंड
1 jan. 2015 on prabhat khabar, patna
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