Sunday, February 22, 2015

गर्ल सुरक्षा की हवा हवाई, सीबीएसइ के नियम नहीं हो रहे फॉलो

गर्ल सुरक्षा की हवा हवाई, सीबीएसइ के नियम नहीं हो रहे फॉलो

- सीबीएसइ ने स्कूली बस में महिला अटेंडर को रखने का दिया था निर्देश
- गुड टच और बैड टच प्रोग्राम हुआ फेल
रिंकू झा, पटना
सुरक्षा की बात पहले होनी चाहिए. घटना के बाद सुरक्षा होने का कोई मतलब नहीं है. 16 दिसंबर 2012 को दिल्ली में रेप की घटना ने सभी को हिला कर रख दिया. ऐसे में सीबीएसइ ने भी स्कूली गर्ल के सुरक्षा को लेकर कई नियम बनाये. यह नियम स्कूल कैंपस, स्कूल बस और अभिभावकों के लिए था. अब जब दो साल बाद सीबीएसइ ने इसकी जांच शुरू की है तो पता चला कि अधिकांश स्कूल में गर्ल सुरक्षा को लेकर कोई नियम फॉलो नहीं हो रहा है. स्कूल बस, स्कूल वैन और ऑटो में बस भगवान भरोसे लड़कियां स्कूल आती जाती है. सीबीएसइ के जांच रिपोर्ट में पता चला है कि कई स्कूलों के वैन तो काफी टूटे हुए है.
लर्निग सेफ इंवायरमेंट दे स्कूल
हर स्कूल को अब अपना कंवियेंस रखना होगा. स्टूडेंट के स्कूल आने और स्कूल से घर तक पहुंचने में स्कूल की पूरी जिम्मेवारी होगी. इसके लिए स्कूल को सुनिश्चित करना होगा कि वो हर बच्चों की सुरक्षा का ध्यान रखें. पटना के कई स्कूल हैं जिनके पास अपना कंवियेंस नहीं है. ऐसे में वो स्टूडेंट्स की सुरक्षा बस स्कूल कैंपस तक ही दे पाते है. ऐसे तमाम स्कूल सीबीएसइ के जांच के कटघरे में आयेंगे. बोर्ड के अनुसार आये दिन अपहरण की मामले सामने आये, जिसमें यह देखा गया है कि बच्चों का अपहरण स्कूल आने और जाने के क्रम में हुआ है.
गुड टच-बैड टच प्रोग्राम नहीं हुआ शुरू
सीबीएसइ ने एक साल पहले जुलाई 2013 में गुड टच-बैड टच प्रोग्राम शुरू किया था. इसके तहत तमाम स्कूलों को क्लास चार से 10वीं तक के गर्ल स्टूडेंट्स को अवेयर करना था. घर से लेकर बाहर और स्कूल कैंपस में गुड टच और बैड टच को लेकर प्रोग्राम आयोजित करना था. इसमें स्टूडेंट्स को जानकारी देनी थी कि उन्हें अगर कोई टच करता है तो उसे किस तरह से समङो.
हेल्पर के रूप में महिला अटेंडर है गायब
सीबीएसइ ने तमाम स्कूलों को स्कूल बस या स्कूल में महिला अटेंडर को रखने की बात कहीं थी. हर स्कूल में दो या तीन महिला अटेंडर होनी चाहिए. नियमित रूप से इसकी नियुक्ति हर स्कूल को करना है. उसमें उन स्कूलों पर अधिक फोकस था जो को-एड थे. लेकिन अधिकांश स्कूलों में महिला अटेंडर नहीं है. स्कूल में तो गायब है ही बाहर स्कूल बस में भी महिला अटेंडर के बदले बस का कंडक्टर को रखा गया है. इससे स्कूल गर्ल की सुरक्षा तो बस अब ड्राइवर और कंडक्टर के हाथ में ही रहता है.
टीचर्स नहीं जाती है बस के लास्ट स्टॉपेज तक
हर स्कूली बसों में स्कूल का एक टीचर होना आवश्यक है. पटना में कई स्कूलों ने इसकी शुरुआत भी की है. स्कूल से चलने वाले तमाम बस में रूट के अनुसार टीचर्स को बैठाया जाता है. टीचर्स बस में स्टूडेंट्स के साथ जाती तो है, लेकिन टीचर्स अपने अनुसार अपने स्टॉपेज पर उतर जाती है. अंतिम बस स्टॉप तक टीचर नहीं जाते है. ऐसे में टीचर के बस से उतरने के बाद बांकी बचे बच्चे ड्राइवर और कंडक्टर के भरोसे की सुरक्षित रहते है. इसको लेकर कोई भी स्कूल जिम्मेवारी लेने को तैयार नहीं है.
नहीं है सेक्सुअल हरासमेंट कमेटी
पटना में एक दो स्कूल की बात छोड़ दे तो किसी भी स्कूल में सेक्युअल हरेसमेंट कमेटी का गठन नहीं किया गया है. ऐसे में अगर किसी लड़की के साथ कोई घटना स्कूल या स्कूल के बाहर होती है तो वह उसे कहीं शेयर नहीं कर पातीं हैं. सीबीएसइ के अनुसार हर स्कूल को टीचर्स की एक कमेटी बनानी थी जो गर्ल स्टूडेंटस के साथ होने वाले किसी भी घटना पर उसकी काउंसेलिंग करें. इसके अलावा लड़कियां भी अपनी किसी भी प्राब्लम को इस कमेटी के पास रख सकती थी.

स्कूलों के लिए यह दिया गया था निर्देश
- स्कूल में एक सेक्सुअल हरेसमेंट कमेटी हो
- हर स्कूल में एक काउंसेलिंग सेंटर हो. इसमें एक साइकोलॉजिस्ट और एक सोशियोलॉजिस्ट होना चाहिए
- स्कूल में गल्र्स के लिए वॉश रूम अलग से हो
- स्कूली बस, ऑटो और वैन की पूरी सुरक्षा की जिम्मेवारी स्कूल की है
- स्कूल बस, ऑटो और वैन में स्टूडेंट्स के साथ एक टीचर का होना जरूरी है
- टीचर जिस बस में बच्चों के साथ  जायेंगे, हर बच्चे को छोड़ने के बाद ही टीचर को बस छोड़नी है
 - महीने में एक या दो बार हर क्लास के लिए गर्ल की सुरक्षा को लेकर अवेयरनेस प्रोग्राम आयोजित होना चाहिए
- लड़कियों को यह निर्देश स्कूल की ओर से दी जायें जिससे कि किसी तरह की प्रॉब्लम होने पर

15 dec. 2015 on prabhat khabar patna 

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