घोड़ा-गाड़ी में गाड़ी तो है, घोड़ा हो रहा गायब
- मीना और जवाहरात के लिए प्रसिद्ध सोनपुर मेला नहीं दिखता सोना और कीमती जवाहरात की निकासी
- पशुओं की तुलना में मोटर गाड़ी खरीदने को आते है खरीदार
संवाददाता, पटना
पांच लाख और 10 लाख के कार की खरीदार तो सैकड़ों मिल रहे है, लेकिन हजारों में मिलने वाले घोड़ा को लेने के लिए खरीदार नहीं है. मोटर गाड़ियों की बुकिंग के लिए हर दिन खरीदार की लाइन लगी रहती है, लेकिन 20 लीटर दूध देने वाली मालती गाय को कोई पूछता तक नहीं है. कभी घरों के दरवाजे पर शान की सवारी होने वाले हाथी की तो हालत और खराब है. खरीदने वाले तो दूर अब इसे देखने तक का नसीब लोगों को नहीं मिल पा रहा है. कभी पशुओं की खरीदारी के लिए प्रसिद्ध हरिहर क्षेत्र सोनपुर मेला में खोजने पर भी पशु नहीं दिखायी देते है. कहा जायें तो मेला में गाड़ियां तो तमाम कंपनियों के मिल जायेंगे, लेकिन 20-25 नस्ल के आने वाले घोड़े अब 5-6 पर आकर सिमट गया है.
- पशु बाजार सिमट गया, फैल मीना बाजार
हर साल सोनपुर मेला के जगहों का फैलाव होता जा रहा है. भीड़ को तितर बितर करने के लिए प्रशासन की ओर से मेला परिसर बढ़ा दिया गया है. स्थानीय निवासी अमरेंद्र कुमार द्विवेदी ने बताया कि महेश चौक, सवाइच, अंग्रेजी बाजार, राहड़ दीयरा आदि तक इस बार मेला परिसर को बढ़ाया गया है. लेकिन इन जगहों पर बस मीना बाजार ही लगा हुआ है. कभी हरिहर नाथ मंदि के आस पास तक मीना बाजार लगता था. बांकी बकरी बाजार, चिड़ियां बाजार और घोड़ा बाजार, गाय भैंस बाजार होता था. अब यह सारा कुछ बदल गया है. अब ये नाम मात्र के रह गये है. खोजने पर भी अब पशु यहां पर शायद की मिलते है. 44 साल से सोनपुर मेला में घोड़ा की खरीद बिक्री करने आते मो. इमाम खान ने बताया कि इस बार 70 फीसदी खरीदारी कम हुई है. जो घोड़ा मुंबई और कानपुर आदि पशु मेला में 5 लाख में घोड़ा बिकता है, वो घोड़ा यहां पर डेढ़ लाख रुपया में भी लोग लेने को तैयार नहीं है. अरबी, मुलतानी, बलहोत्र, पंजाब आदि नस्ल के घोड़ा कम दामों में भी लोग लेने को तैयार नहीं है.
- एक महीने से पहले ही खत्म हो जाता है पशु मेला
सोनपुर मेला भले एक महीने तक चलता हो, लेकिन अब पशु मेला इतने दिनों तक नहीं रहता है. खरीदार नहीं मिलने के कारण व्यापारी दस दिनों के बाद पशुओं को वापस ले जाने लगते है. चारा खिलाने के पैसे भी नहीं निकलने के कारण व्यापारी पशुओं को लेकर चले जाते है. सीवान से आयें व्यापारी मो. सलीम ने बताया कि पशुओं को जहां रखा जाता है. वहां पर किसी तरह की व्यवस्था नहीं होती है. एक तो खरीदार नहीं मिलते और ना ही पशुओं और व्यापारी के लिए कोई व्यवस्था होती है. पशुओं को खिलाने के लिए चारा के पैसे भी हमें नहीं मिलता. इस कारण हम मेला शुरू होने के दस दिन के बाद सारे व्यापारी जाने लगते है. सोनपुर मेला में गाय और भैंस का जा चुके है. हाथी एक दो है, बस प्रदर्शनी के लिए. बकरी बाजार में बकरी को भी हटाया जा रहा है. घोड़ा बाजार से दो से तीन दिनों घोड़ा भी व्यापारी हटा लेगे.
- कार की बुकिंग के साथ खरीदार भी बढ़ रहे
किस कंपनी की गाड़ी अच्छी होती है. कंपनी की ओर से लोन का यहां व्यवस्था है. कार में सुविधाएं किस तरह की है. इन तमाम बातों की जानकारी लेने के लिए हर दिन सैकड़ों लोग मेला में आते है. परिसर में लगे तमाम कंपनियों से मिली जानकारी के अनुसार हर साल इसकी संख्या बढ़ती जा रही है. मारूती सूजुकी स्टॉल के रूरल सेल्स मैनेजर पंकज कुमार ने बताया कि हर दिन 10 से 12 लोग कार की बुकिंग करवा रहे है. वहीं टीवीएस और होंडा कंपनी स्टॉल पर भी अभी तक 100 के उपर गाड़ी की खरीदारी हो चुकी है. होंडा कंपनी के नेटवर्क मैनेजर निशांत श्रीवास्तव ने बताया कि हम लोग पिछले चार सालों से आ रहे है. हर साल खरीदारी और बुकिंग की संख्या बढ़ती जा रही है.
- कभी हीरा और जवाहरात मिलता था मीना बाजार में
सोनपुर मेला में कभी सोनार पट्टी लगता था. इस सोनार पट्टी में बनारस, सूरत आदि जगहों से कारीगर आते थे. हीरा, जवाहरात, सोने के लिए सांचे पर सामने में डिजाइन कर दिया जाता था. पिछले 60 साल से सोनपुर मेला के मीना बाजार के गवाह बने सीता राम साहनी ने बताया कि मीना बाजार बस अब नाम मात्र का रह गया है. कभी यहां पर हीरा, जवाहरात और सोने की खरीदारी करने वालों की भीड़ लगी रहती थी, लेकिन अब वो बाजार उठ गया है. अब ना तो कारीगर आते है और ना ही खरीदार आते है. सिंदूर गली से अब रंग-बिरंगे सिंदूर तैयार नहीं होता है. सिंदूर गली में पंडित अनिल कुमार द्विवेदी ने बताया कि पहले यहां के सिंदूर गली से सिंदूर तैयार किया जाता था. इस गली में बस सिंदूर की खरीदारी होती थी. लेकिन अब तीन चार सालों से यह भी खत्म हो गया है.
22 nev 2015 on prabhat khabar patna
- मीना और जवाहरात के लिए प्रसिद्ध सोनपुर मेला नहीं दिखता सोना और कीमती जवाहरात की निकासी
- पशुओं की तुलना में मोटर गाड़ी खरीदने को आते है खरीदार
संवाददाता, पटना
पांच लाख और 10 लाख के कार की खरीदार तो सैकड़ों मिल रहे है, लेकिन हजारों में मिलने वाले घोड़ा को लेने के लिए खरीदार नहीं है. मोटर गाड़ियों की बुकिंग के लिए हर दिन खरीदार की लाइन लगी रहती है, लेकिन 20 लीटर दूध देने वाली मालती गाय को कोई पूछता तक नहीं है. कभी घरों के दरवाजे पर शान की सवारी होने वाले हाथी की तो हालत और खराब है. खरीदने वाले तो दूर अब इसे देखने तक का नसीब लोगों को नहीं मिल पा रहा है. कभी पशुओं की खरीदारी के लिए प्रसिद्ध हरिहर क्षेत्र सोनपुर मेला में खोजने पर भी पशु नहीं दिखायी देते है. कहा जायें तो मेला में गाड़ियां तो तमाम कंपनियों के मिल जायेंगे, लेकिन 20-25 नस्ल के आने वाले घोड़े अब 5-6 पर आकर सिमट गया है.
- पशु बाजार सिमट गया, फैल मीना बाजार
हर साल सोनपुर मेला के जगहों का फैलाव होता जा रहा है. भीड़ को तितर बितर करने के लिए प्रशासन की ओर से मेला परिसर बढ़ा दिया गया है. स्थानीय निवासी अमरेंद्र कुमार द्विवेदी ने बताया कि महेश चौक, सवाइच, अंग्रेजी बाजार, राहड़ दीयरा आदि तक इस बार मेला परिसर को बढ़ाया गया है. लेकिन इन जगहों पर बस मीना बाजार ही लगा हुआ है. कभी हरिहर नाथ मंदि के आस पास तक मीना बाजार लगता था. बांकी बकरी बाजार, चिड़ियां बाजार और घोड़ा बाजार, गाय भैंस बाजार होता था. अब यह सारा कुछ बदल गया है. अब ये नाम मात्र के रह गये है. खोजने पर भी अब पशु यहां पर शायद की मिलते है. 44 साल से सोनपुर मेला में घोड़ा की खरीद बिक्री करने आते मो. इमाम खान ने बताया कि इस बार 70 फीसदी खरीदारी कम हुई है. जो घोड़ा मुंबई और कानपुर आदि पशु मेला में 5 लाख में घोड़ा बिकता है, वो घोड़ा यहां पर डेढ़ लाख रुपया में भी लोग लेने को तैयार नहीं है. अरबी, मुलतानी, बलहोत्र, पंजाब आदि नस्ल के घोड़ा कम दामों में भी लोग लेने को तैयार नहीं है.
- एक महीने से पहले ही खत्म हो जाता है पशु मेला
सोनपुर मेला भले एक महीने तक चलता हो, लेकिन अब पशु मेला इतने दिनों तक नहीं रहता है. खरीदार नहीं मिलने के कारण व्यापारी दस दिनों के बाद पशुओं को वापस ले जाने लगते है. चारा खिलाने के पैसे भी नहीं निकलने के कारण व्यापारी पशुओं को लेकर चले जाते है. सीवान से आयें व्यापारी मो. सलीम ने बताया कि पशुओं को जहां रखा जाता है. वहां पर किसी तरह की व्यवस्था नहीं होती है. एक तो खरीदार नहीं मिलते और ना ही पशुओं और व्यापारी के लिए कोई व्यवस्था होती है. पशुओं को खिलाने के लिए चारा के पैसे भी हमें नहीं मिलता. इस कारण हम मेला शुरू होने के दस दिन के बाद सारे व्यापारी जाने लगते है. सोनपुर मेला में गाय और भैंस का जा चुके है. हाथी एक दो है, बस प्रदर्शनी के लिए. बकरी बाजार में बकरी को भी हटाया जा रहा है. घोड़ा बाजार से दो से तीन दिनों घोड़ा भी व्यापारी हटा लेगे.
- कार की बुकिंग के साथ खरीदार भी बढ़ रहे
किस कंपनी की गाड़ी अच्छी होती है. कंपनी की ओर से लोन का यहां व्यवस्था है. कार में सुविधाएं किस तरह की है. इन तमाम बातों की जानकारी लेने के लिए हर दिन सैकड़ों लोग मेला में आते है. परिसर में लगे तमाम कंपनियों से मिली जानकारी के अनुसार हर साल इसकी संख्या बढ़ती जा रही है. मारूती सूजुकी स्टॉल के रूरल सेल्स मैनेजर पंकज कुमार ने बताया कि हर दिन 10 से 12 लोग कार की बुकिंग करवा रहे है. वहीं टीवीएस और होंडा कंपनी स्टॉल पर भी अभी तक 100 के उपर गाड़ी की खरीदारी हो चुकी है. होंडा कंपनी के नेटवर्क मैनेजर निशांत श्रीवास्तव ने बताया कि हम लोग पिछले चार सालों से आ रहे है. हर साल खरीदारी और बुकिंग की संख्या बढ़ती जा रही है.
- कभी हीरा और जवाहरात मिलता था मीना बाजार में
सोनपुर मेला में कभी सोनार पट्टी लगता था. इस सोनार पट्टी में बनारस, सूरत आदि जगहों से कारीगर आते थे. हीरा, जवाहरात, सोने के लिए सांचे पर सामने में डिजाइन कर दिया जाता था. पिछले 60 साल से सोनपुर मेला के मीना बाजार के गवाह बने सीता राम साहनी ने बताया कि मीना बाजार बस अब नाम मात्र का रह गया है. कभी यहां पर हीरा, जवाहरात और सोने की खरीदारी करने वालों की भीड़ लगी रहती थी, लेकिन अब वो बाजार उठ गया है. अब ना तो कारीगर आते है और ना ही खरीदार आते है. सिंदूर गली से अब रंग-बिरंगे सिंदूर तैयार नहीं होता है. सिंदूर गली में पंडित अनिल कुमार द्विवेदी ने बताया कि पहले यहां के सिंदूर गली से सिंदूर तैयार किया जाता था. इस गली में बस सिंदूर की खरीदारी होती थी. लेकिन अब तीन चार सालों से यह भी खत्म हो गया है.
22 nev 2015 on prabhat khabar patna
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