मैट्रिक के बाद नाम परिवर्तन करना पड़ेगा भारी
- कई की चली गयी नौकरी
- बिहार बोर्ड के पास आयें कई केस, नहीं होता कोई परिवर्तन
संवाददाता, पटना
मैट्रिक पास करने के बाद अपना नाम परिवर्तन ना करवायें, क्योंकि अगर कोई छात्र मैट्रिक पास करने के बाद अपना नाम परिवर्तन करवाता है तो उसे महंगा पड़ सकता है. एक बार मैट्रिक में जिस नाम का रजिस्ट्रेशन हो जाता है, उसके बाद किसी भी सूरत में परिवर्तन नहीं किया जा सकता है. बिहार बोर्ड के पास आये दिन ऐसे केस आते है. जिसमें छात्र अपने मैट्रिक के नाम में परिवर्तन चाहते है. लेकिन बोर्ड से उन्हें वापस जाना होता है. बोर्ड के अनुसार एक बार मैट्रिक के सर्टिफिकेट पर जो नाम और जन्म तिथि आ जाता है, उसे किसी भी तरह से परिवर्तन नहीं किया जा सकता है.
- लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है
अगर कोई छात्र मैट्रिक के नाम में परिवर्तन करना चाहता है तो इसे बोर्ड और छात्र को लंबी प्रक्रिया करना पड़ता है. इसकी शुरुआत स्कूल लेवल पर होती है. छात्र के आवेदन देने के बाद उस स्कूल से उस साल का रजिस्टर मंगवाया जाता है जिसमें उस छात्र का नाम स्कूल के दिनों में है. उस रजिस्टर के साथ स्कूल के दिनों के और भी कई चीजों को छात्र के नाम के साथ मिलान किया जाता है. सूत्रों के मुताबिक किसी भी स्कूल के पास इतने सालों का रजिस्टर नहीं होता है. इस कारण यह प्रैक्टिकली संभव नहीं हो पाता है. स्कूल के बेस पर ही छात्र के नाम में परिवर्तन हो सकता है. इसमें मात्र प्राचार्य के कहने मात्र से काम नहीं चलेगा.
- राहुल शर्मा को नहीं मिली नौकरी (केस वन)
राहुल शर्मा ने मैट्रिक 1998 में पास किया. मैट्रिक में पिता के नाम के स्पेलिंग (मनीष शर्मा की जगह मनीषी शर्मा) में चेंज हो गया. मैट्रिक में इस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया और राहुल शर्मा मैट्रिक की परीक्षा पास कर गये. इंटर में राहुल शर्मा ने नये रजिस्ट्रेशन के समय पिता के सही नाम लिखवाया. पिता के इसी नाम से उन्होंने इंटर के बाद तमाम उच्च शिक्षा भी ली. जब नौकरी के लिए अप्लाई करने में मैट्रिक के साथ इंटर का सर्टिफिकेट मांगा गया और राहुल शर्मा ने जमा किया. सारी क्वाफिकेशन होने के बावजूद राहुल शर्मा के आवेदन के इस बेस का रिजेक्ट कर दिया गया कि उनके दोनों सर्टिफिकेट पर पिता के दो नाम है. फिर राहुल ने बिहार बोर्ड के पास आवेदन दिया जिसमें उन्होंने पिता कि वास्तविक नाम डालने को कहा. लेकिन बिहार बोर्ड ने यह कह कर राहुल शर्मा को वापस कर दिया कि इंटर के बेस पर मैट्रिक सर्टिफिकेट में कोई परिवर्तन नहीं किया जा सकता है.
- सात महीने भटकने के बाद भी नहीं मिला इंटर का सर्टिफिकेट (केस टू)
अमिताभ चंद्रा 1986 में मैट्रिक पास किये. फिर इन्होंने अपने नाम में परिवर्तन कर अमिताभ चंद्रा की जगह अमिताभ दीक्षित कर दिया. अमिताभ दीक्षित के नाम से ही तमाम उच्च शिक्षा ग्रहण किया. अब एक जगह आवेदन करने के लिए अमिताभ दीक्षित को इंटर का सर्टिफिकेट चाहिए. इसके लिए उन्होंने पहले इंटर काउंसिल में आवेदन दिया. काउंसिल ने पिता का नाम जानने के लिए मैट्रिक का सर्टिफिकेट मांगा. इनके भी आवेदन को रिजेक्ट कर दिया गया. बोर्ड के अनुसार अगर अमिताभ दीक्षित को इंटर का सर्टिफिकेट दिया जायेगा तो बस अमिताभ चंद्रा के नाम से. क्योकि स्कूल को आधार मान कर मैट्रिक में अमिताभ चंद्रा लिखा हुआ है. सात महीने बोर्ड का चक्कर लगाने के बाद भी अमिताभ दीक्षित को न्याय नहीं मिला.
- साल में 15 से 20 केस आ जाते है
बिहार बोर्ड के पास आयें दिन ऐसे केस आते है. इसमें मैट्रिक के बाद नाम परिवर्तन के कारण फंसे मामले को बिहार बोर्ड सुलझा नहीं पाती है. सूत्रों के मुताबिक साल में 15 से 20 ऐसे केस आ जाते है. लेकिन सभी को वापस जाना पड़ता है. पहले बिहार बोर्ड और इंटर काउंसिल अलग-अलग था. ऐसे में इंटर के सर्टिफिकेट बन जाते थे. लेकिन अब ऐसा नहीं होता है. कई बार बोर्ड के पास छात्र के सर्टिफिकेट वेरिफिकेशन के लिए भी आवेदन आते है. ऐसे में बोर्ड मैट्रिक का नाम के साथ तमाम जानकारी उन्हें उपलब्ध करवाता है.
- 10वीं के रजिस्ट्रेशन से ही होता था प्लस टू की परीक्षा
नाम में परिवर्तन आदि मामले में छात्र नहीं फंसे, इसके लिए बोर्ड ने एक व्यवस्था की. मैट्रिक और इंटर के एक साथ बिहार विद्यालय परीक्षा समिति में हो जाने के बाद 10वीं के रजिस्ट्रेशन पर ही 12वीं में भी छात्र परीक्षा फार्म भर सकते थे. इससे नाम परिवर्तन की संभावना नहीं होती थी. अगर किसी छात्र ने नाम में परिवर्तन किया भी तो उसे तुरंत सही कर दिया जाता था. क्योंकि एक ही जगह पर परिवर्तन करने की जरूरत होती थी. अब फिर दुबारा 10वीं और 12वीं के लिए अलग से रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया होती है.
कोट
बोर्ड के पास ऐसे केस आते है. लेकिन इसमें कोई परिवर्तन नहीं किया जा सकता है. क्योंकि स्कूल में छात्र के नाम को आधार मान कर मैट्रिक की सारी प्रक्रिया होती है. उसके बाद सारा बेसिक मैट्रिक हो जाता है. इस कारण जो परिवर्तन करें, मैट्रिक में कर ले. इसके बाद नाम और जन्म तिथि में परिवर्तन नहीं किया जा सकता है.
राजमणि प्रसाद, पूर्व अध्यक्ष, बिहार विद्यालय परीक्षा समिति
इस तरह के कई केस आयें है. लेकिन इसमें कोई परिवर्तन नहीं हो सकता है. क्योकि इसमें बोर्ड को कोई नुकसान नहीं होगा. छात्र खुद ही फंस जायेंगे. क्योकि भविष्य में अगर हमारे पास वेरिफिकेशन के लिए मामले आयेंगे तो हम मैट्रिक का नाम ही देंगे. इससे उनकी नौकरी चली जायेगी.
लालकेश्वर प्रसाद सिंह, अध्यक्ष, बिहार विद्यालय परीक्षा समिति
23 nev 2015 on prabhat khabar patna
- कई की चली गयी नौकरी
- बिहार बोर्ड के पास आयें कई केस, नहीं होता कोई परिवर्तन
संवाददाता, पटना
मैट्रिक पास करने के बाद अपना नाम परिवर्तन ना करवायें, क्योंकि अगर कोई छात्र मैट्रिक पास करने के बाद अपना नाम परिवर्तन करवाता है तो उसे महंगा पड़ सकता है. एक बार मैट्रिक में जिस नाम का रजिस्ट्रेशन हो जाता है, उसके बाद किसी भी सूरत में परिवर्तन नहीं किया जा सकता है. बिहार बोर्ड के पास आये दिन ऐसे केस आते है. जिसमें छात्र अपने मैट्रिक के नाम में परिवर्तन चाहते है. लेकिन बोर्ड से उन्हें वापस जाना होता है. बोर्ड के अनुसार एक बार मैट्रिक के सर्टिफिकेट पर जो नाम और जन्म तिथि आ जाता है, उसे किसी भी तरह से परिवर्तन नहीं किया जा सकता है.
- लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है
अगर कोई छात्र मैट्रिक के नाम में परिवर्तन करना चाहता है तो इसे बोर्ड और छात्र को लंबी प्रक्रिया करना पड़ता है. इसकी शुरुआत स्कूल लेवल पर होती है. छात्र के आवेदन देने के बाद उस स्कूल से उस साल का रजिस्टर मंगवाया जाता है जिसमें उस छात्र का नाम स्कूल के दिनों में है. उस रजिस्टर के साथ स्कूल के दिनों के और भी कई चीजों को छात्र के नाम के साथ मिलान किया जाता है. सूत्रों के मुताबिक किसी भी स्कूल के पास इतने सालों का रजिस्टर नहीं होता है. इस कारण यह प्रैक्टिकली संभव नहीं हो पाता है. स्कूल के बेस पर ही छात्र के नाम में परिवर्तन हो सकता है. इसमें मात्र प्राचार्य के कहने मात्र से काम नहीं चलेगा.
- राहुल शर्मा को नहीं मिली नौकरी (केस वन)
राहुल शर्मा ने मैट्रिक 1998 में पास किया. मैट्रिक में पिता के नाम के स्पेलिंग (मनीष शर्मा की जगह मनीषी शर्मा) में चेंज हो गया. मैट्रिक में इस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया और राहुल शर्मा मैट्रिक की परीक्षा पास कर गये. इंटर में राहुल शर्मा ने नये रजिस्ट्रेशन के समय पिता के सही नाम लिखवाया. पिता के इसी नाम से उन्होंने इंटर के बाद तमाम उच्च शिक्षा भी ली. जब नौकरी के लिए अप्लाई करने में मैट्रिक के साथ इंटर का सर्टिफिकेट मांगा गया और राहुल शर्मा ने जमा किया. सारी क्वाफिकेशन होने के बावजूद राहुल शर्मा के आवेदन के इस बेस का रिजेक्ट कर दिया गया कि उनके दोनों सर्टिफिकेट पर पिता के दो नाम है. फिर राहुल ने बिहार बोर्ड के पास आवेदन दिया जिसमें उन्होंने पिता कि वास्तविक नाम डालने को कहा. लेकिन बिहार बोर्ड ने यह कह कर राहुल शर्मा को वापस कर दिया कि इंटर के बेस पर मैट्रिक सर्टिफिकेट में कोई परिवर्तन नहीं किया जा सकता है.
- सात महीने भटकने के बाद भी नहीं मिला इंटर का सर्टिफिकेट (केस टू)
अमिताभ चंद्रा 1986 में मैट्रिक पास किये. फिर इन्होंने अपने नाम में परिवर्तन कर अमिताभ चंद्रा की जगह अमिताभ दीक्षित कर दिया. अमिताभ दीक्षित के नाम से ही तमाम उच्च शिक्षा ग्रहण किया. अब एक जगह आवेदन करने के लिए अमिताभ दीक्षित को इंटर का सर्टिफिकेट चाहिए. इसके लिए उन्होंने पहले इंटर काउंसिल में आवेदन दिया. काउंसिल ने पिता का नाम जानने के लिए मैट्रिक का सर्टिफिकेट मांगा. इनके भी आवेदन को रिजेक्ट कर दिया गया. बोर्ड के अनुसार अगर अमिताभ दीक्षित को इंटर का सर्टिफिकेट दिया जायेगा तो बस अमिताभ चंद्रा के नाम से. क्योकि स्कूल को आधार मान कर मैट्रिक में अमिताभ चंद्रा लिखा हुआ है. सात महीने बोर्ड का चक्कर लगाने के बाद भी अमिताभ दीक्षित को न्याय नहीं मिला.
- साल में 15 से 20 केस आ जाते है
बिहार बोर्ड के पास आयें दिन ऐसे केस आते है. इसमें मैट्रिक के बाद नाम परिवर्तन के कारण फंसे मामले को बिहार बोर्ड सुलझा नहीं पाती है. सूत्रों के मुताबिक साल में 15 से 20 ऐसे केस आ जाते है. लेकिन सभी को वापस जाना पड़ता है. पहले बिहार बोर्ड और इंटर काउंसिल अलग-अलग था. ऐसे में इंटर के सर्टिफिकेट बन जाते थे. लेकिन अब ऐसा नहीं होता है. कई बार बोर्ड के पास छात्र के सर्टिफिकेट वेरिफिकेशन के लिए भी आवेदन आते है. ऐसे में बोर्ड मैट्रिक का नाम के साथ तमाम जानकारी उन्हें उपलब्ध करवाता है.
- 10वीं के रजिस्ट्रेशन से ही होता था प्लस टू की परीक्षा
नाम में परिवर्तन आदि मामले में छात्र नहीं फंसे, इसके लिए बोर्ड ने एक व्यवस्था की. मैट्रिक और इंटर के एक साथ बिहार विद्यालय परीक्षा समिति में हो जाने के बाद 10वीं के रजिस्ट्रेशन पर ही 12वीं में भी छात्र परीक्षा फार्म भर सकते थे. इससे नाम परिवर्तन की संभावना नहीं होती थी. अगर किसी छात्र ने नाम में परिवर्तन किया भी तो उसे तुरंत सही कर दिया जाता था. क्योंकि एक ही जगह पर परिवर्तन करने की जरूरत होती थी. अब फिर दुबारा 10वीं और 12वीं के लिए अलग से रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया होती है.
कोट
बोर्ड के पास ऐसे केस आते है. लेकिन इसमें कोई परिवर्तन नहीं किया जा सकता है. क्योंकि स्कूल में छात्र के नाम को आधार मान कर मैट्रिक की सारी प्रक्रिया होती है. उसके बाद सारा बेसिक मैट्रिक हो जाता है. इस कारण जो परिवर्तन करें, मैट्रिक में कर ले. इसके बाद नाम और जन्म तिथि में परिवर्तन नहीं किया जा सकता है.
राजमणि प्रसाद, पूर्व अध्यक्ष, बिहार विद्यालय परीक्षा समिति
इस तरह के कई केस आयें है. लेकिन इसमें कोई परिवर्तन नहीं हो सकता है. क्योकि इसमें बोर्ड को कोई नुकसान नहीं होगा. छात्र खुद ही फंस जायेंगे. क्योकि भविष्य में अगर हमारे पास वेरिफिकेशन के लिए मामले आयेंगे तो हम मैट्रिक का नाम ही देंगे. इससे उनकी नौकरी चली जायेगी.
लालकेश्वर प्रसाद सिंह, अध्यक्ष, बिहार विद्यालय परीक्षा समिति
23 nev 2015 on prabhat khabar patna
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