Monday, July 20, 2015

नियम हैं ताक पर, ऑटो के फ्रंट सीट पर भी बैठते हैं स्कूली बच्चे

- सीबीएसइ और आइसीएसइ बोर्ड के नियम को स्कूल वाले रख रहे ताक पर
- 2011 में ही पटना ट्रैफिक पुलिस ने बनाया था स्कूली वाहनों पर नियम
संवाददाता, पटना
स्कूल की बस हो या स्कूली वैन हो या स्कूली ऑटो, हर सवारी में बच्चें आलू प्याज ठूस दिये जाते हैं. अगर स्कूली वाहनों को देख लिया जायें तो लगेगा कि कभी भी कोई बच्च ऑटो से गिर सकता है. ना तो स्पीड पर लगाम और ना ही बच्चे के सुरक्षा का ख्याल, बस स्कूल से बच्चे को घर छोड़ने और घर से स्कूल छोड़ने की होती हैं जल्दी. ऐसे मे हर बच्च का जान जोखिम से भरा होता है. स्कूली वाहनों को लेकर कई बार नियम भी बनाये गये, लेकिन इसका ना तो स्कूल वाले और ना ही ऑटो वाले और ना ही अभिभावक ही सजग हो रहें हैं.
- स्कूल वाले नहीं लेते जिम्मेवारी
पटना ट्रैफिक पुलिस के कई बार कहने के बावजूद स्कूल वाले स्कूल के किसी भी वाहन को लेकर जिम्मेवारी नहीं लेते है. स्कूल का कहना होता हैं कि बच्चे की जिम्मेवारी बस स्कूल कैंपस तक ही हैं, स्कूल कैंपस के बाहर बच्चे गये तो उसकी जिम्मेवारी अभिभावकों की होती है. वहीं ट्रैफिक पुलिस कई बार स्कूल को इसकी जिम्मेवारी लेने को कह चुकी हैं, लेकिन स्कूल हर बार पलड़ा झाड़ लेता है.
- 2011 में पटना ट्रैफिक पुलिस ने बनाया था नियम
ट्रैफिक पुलिस की ओर से 9 अप्रैल 2011 में स्कूली वाहन को लेकर नियम बनाया गया था. इसके तहत पटना मे 88 स्कूलों के नोटिस बोर्ड यह सूचना डाली गयी थी. इसमें कहा गया था कि स्टूडेंट्स जिस भी वाहन से स्कूल आते है, उस पर स्कूल को ध्यान देना चाहिए. हर छोटे ऑटो में तीन बच्चे से अधिक नहीं होना चाहिए. वहीं बड़े ऑटो में छह बच्चे ही होना चाहिए.
- किराया अधिक ना देना पड़े, इससे अभिभावक करते हैं लापरवाही
पटना के कई बड़े स्कूल के पास अपना निजी वाहन नहीं हैं. ऐसे में प्राइवेट ऑटो, वैन और रिक्शा का इस्तेमाल स्कूल आने और जाने के लिए किया जाता है. जिस एरिया के बच्चे एक ही स्कूल में पढ़ते हैं, उस एरिया के बच्चे एक ही साथ स्कूल एक ही वाहन में जाते हैं. ऐसे में अभिभावक उसी वाहन में बच्चे को भेजना चाहते हैं. अगर किसी ऑटो में सीट फुल हो जाती है, तो भी अभिभावक जबरदस्ती उसी ऑटो में बच्चें को भेजना चाहते हैं. एक सीट पर दो बच्चे को ले जाने के लिए ऑटो वाले भी पैसे कम लेते हैं. नॉट्रेडम एकेडमी और लोयेला हाई स्कूल में ऑटो चला रहा ड्राइवर दिनेश ने बताया कि ऑटो में सारी सीटें भर जाने के बाद भी अभिभावक के जिद के आगे हमें बच्चे को लेना होता हैं. ऐसे में एक सीट पर दो बच्चे को हम बैठाते हैं. इससे किराया आधा हो जाता हैं. दो अभिभावकों के बीच किराये के पैसे बंट जाते हैं.
- पीछे की सीटों पर उघते रहते हैं बच्चे
कई बार ऑटो वाले पीछे के सीटों पर बच्चों को बैठा देते हैं. ऐसे में बच्चे पीछे की सीट पर बैठकर उघते रहते हैं. कई बार तो कई बच्चे सो तक जाते हैं. उनके पांव पर ही भारी बैग भी ऑटो वाले रख देते हैं. इतना ही नहीं अगर कोई बच्च शैतान होता हैं तो आपस में लड़ाई झगड़े तक होता रहता हैं, लेकिन ऑटो वाले अपनी धुन में रहते हैं. इसके अलावा आगे की सीटों पर ड्राइवर के दोनों ही बगल में बच्चे को बैठा दिया जाता हैं. आगे के सीटों पर बच्चे को बैठा तो लिया जाता हैं, लेकिन सुरक्षा को लेकर कुछ भी पकड़ने के लिए नहीं होता है, इससे बच्चे जान जोखिम में डाल कर आगे की सीट पर बैठे रहते हैं.


ये नियम बने से स्कूली वाहनों के लिए
स्कूली बस के लिए
- जितनी सीटें उतनी ही बच्चे को बैठा जायेगा
- बच्चे के स्कूली बैग को रखने के लिए जगह होना चाहिए
- ड्राइवर के बगल वाली सीटों पर बच्चे को नही बैठना हैं
- बस की गेट वहीं खुलेगा जहां पर स्टॉपेज होगा
- बस की स्पीड अधिकतम 20 किलोमीटर होना चाहिए

स्कूली वैन के लिए
- स्कूली वैन में दोनों ओर सीसे लगे होंगे
- बेंच देकर वैन में बच्चे को नहीं बैठाया जायेगा
- वैन के आगे के सीट पर बच्चे को नहीं बैठाना हैं
- स्कूल बैग वैन के अंदर ही रखा जायें. उसके लिए एक जगह फिक्स हेानी चाहिए

स्कूली ऑटो के लिए
- तीन सीट वाले ऑटो में तीन बच्चे को ही बैठाया जायेगा
- बड़े ऑटो में छह बच्चे से अधिक नहीं होना चाहिए
- सीट के एक तरफ से ही उतरने की सुविधा दी जायेगी. दूसरी ओर लोहा लगा रहेगा
- ड्राइवर के बगल में बच्चे नहीं बैठेंगे
- ऑटो की स्पीड लिमिट हो
- पीछे और आगे की सीटों पर बच्चों को नहीं बैठाया जा सकता हैं 

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