Sunday, February 28, 2016

...जिसने किया लिखने के लिए इंस्पायर, जाने के बाद वहीं बन गयी सेल्फ मोटिवेटर

 मां की मौत से टूट चुकी स्वाति आज बन रही दूसरों के लिए इंस्पीरेशन

संवाददाता, पटनामुझमे कहीं आज भी जिंदा है तू, समंदर की लहरों सी बहती है मुझमे तू, हर पल थी मेरे जीने की मकसद, आज भी तेरे सपनों से मुझे राह दिखाती है तू.... अक्सर हम जिंदगी से हार कर उन चीजों को छोड़ देते है जो हमें परेशान करती है. लेकिन अगर उसी परेशानी को अपनी ताकत बना कर हम आगे बढ़े तो दूसरों के लिए इंस्पीरेशन बन जाते है. मां के मौत के बाद स्वाति के लिए हर पल काफी मुश्किल था. पूरी तरह से टूट चुकी स्वाति ने मां की कहीं गयी बातों को सेल्फ मोटिवेटर बनाया और चल पड़ी अपने रास्ते खुद बनाने को. कमजोर, दूसरों पर निर्भरता, दुर्बल समझी जाने वाली औरत के पहचान को बदल कर ताकत और आत्मनिर्भर बन स्वाति ने मां को सेल्फ मोटिवेटर बनाया और अपनी हर बातें लिखती चलीं गयी. आज स्वाति की यह लेखनी एक नॉवेल का रूप ले चुकी है. पटना ही नहीं, देश और अब विदेशों में भी काफी डिमांड में है. विदाउट ए गुडबाइ नाम का यह नॉवेल स्वाति के लिए जहां ताकत बन गयी है वहीं दूसरों के लिए इंस्पीरेशन बन रही है.

- बचपन की लेखनी, जिंदगी का बन गया मकसद स्वाति को बचपन से ही लिखने का शौक था. हाई स्कूल कानपुर से करने के बाद स्वाति 2007 में पटना आ गयी. मगध विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन करने के बाद नेशनल स्कूल ऑफ बिजनेस, बंग्लोर से एमबीए किया. इसी बीच एक्सचेंज प्रोग्राम के तहत 2012 में छह महीने के लिए फ्रांस जाने का भी मौका मिला. इसी बीच 2012 अक्टूबर में मां की मौत ने स्वाति को पूरी तरह से तोड़ दिया. बंग्लोर में नौकरी छोड़ स्वाति पटना आ गयी. आंसू थे जो आंख का साथ नहीं छोड़ रहे थे. कैरियर खत्म हो चुका था. जिंदगी ब्रेक डाउन हो गया था. स्वाति ने बताया कि जिंदगी से कोई प्यार नहीं रह गया था. इसी में एक पल के लिए लगा कि आखिर मेरा रियल लाइफ क्या है. मै किस चीज से भाग रही हूं. फिर मैने मां को सेल्फ मोटिवेटर के तौर पर लेना शुरू कर दिया. उनकी स्थिति और उनकी बातों को लिखना शुरू कर दिया. अपनी लाइफ से खुद लड़ाई करना शुरू किया. धीरे-धीरे वो मेरी ताकत बनती गयी. यही वहज है कि आज मुझे लोग लेखिका के नाम से जानते है.
- दो आैरतों की कहानी बयां करती विदाउट ए गुडबाइ हम भले कहें कि समाज में औरतों की स्थित सुधर गयी है. लेकिन ऐसा नहीं है, आज भी हमारा समाज औरतों को सेल्फ डिसीजन लेने नहीं देता है. तरह तरह से दबाव डाले जाते है. औरतों के दो रूपों की कहानी इस नॉवेल के माध्यम से स्वाति ने रखी है. एक वो जो आज की जेनरेशन की लड़की है. और वहीं दूसरी उसी जेनरेशन की लड़की की मां की कहानी. जो आज भी पिता के उपर निर्भर है. अपने नॉवेल के बारे में स्वाति बताती है कि किस तरह से एक मां खुद के जिंदगी से लाचार हो कर अपनी बेटी का समाज का सीख देती है. अपने लिए रास्ते खुद चूनने का अधिकारी बताती है. औरत के जिंदगी के दो अलग-अलग पहलूंओं को इस नॉवेल के माध्यम से रखने की कोशिश की गयी है.
- ऑन लाइन कॉमेंट पहुंच चुका है दस हजार के उपर पटना बुक फेयर में खासा चर्चा में रही स्वाति की यह नॉवेल देश के कई विवि ने लाइब्रेरी में जगह दिया है. इतना ही नहीं हाल में दिल्ली विवि की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम में स्वाति मुख्य अतिथि के तौर पर मौजूद थी. स्वाति ने बताया कि ऑन लाइन बुक को देश के साथ विदेशों से काफी कॉमेंट मिले है. अभी तक दस हजार से उपर इस नॉवेल को कॉमेंट मिल चुके है. कविताओं और कहानी लिखने की शौकिन स्वाति का अपना ब्लॉग भी है. स्वाति ने बताया कि वो महिलाओं के उन मुददों को वो अपनी लेखनी के माध्यम से उठाना चाह रही है जो समाज में दब कर रह गया है. 

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