Wednesday, February 3, 2016

नया नामांकन में कोटे के चक्कर में फंस रहे अभिभाव

- कोटा के सीटों पर नामांकन होने के बाद ही जेनरल बच्चों को मिलता है मौका

संवाददाता, पटनानये नामांकन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. हर पैरेेंट्स नामांकन की उम्मीद लिये स्कूलों की चक्कर लगा रहे है. एक पैरेंट्स कई स्कूलों में आवेदन फाॅर्म भर रहे है. पैंरेंट्स डरते है कि अगर एक स्कूल में नामांकन के लिए लिस्ट मे नाम नहीं आयेगा तो फिर क्या होगा. ऐसे में दूसरे स्कूल को भी पैरेंट्स आप्सन में रखना चाह रहे है. पैरेंट्स तो अपना आप्सन बनाये रख रहे है, लेकिन स्कूल में चल रहे नामांकन में कोटा के चक्कर का उन्हें पता नहीं है. नये नामांकन को लेकर रिजर्वेशन के चक्कर में वो हर अभिभावक फंसते है जो जेनरल केटेगरी में आते है. ऐसे बच्चे का नामांकन होना कठिन हो जाता है जो पूरी तरह से नये है.
- पांच कोटा में नहीं है तो मुश्किल है नामांकन नये नामांकन में अगर स्कूल द्वारा निर्धारित फाइव कोटा में नहीं आते है तो नया नामांकन लेना मुश्किल होता है. जो बच्चे इन फाइव कोटा में होते है, उनका नामांकन आसानी से हो जाता है. लेकिन जो इसमें नहीं आते है, उनका नामांकन बस भगवान भरोसे होता है. नाम आ गया तो नामांकन हो गया, नहीं तो स्कूल वाले बाहर का रास्ता दिखा देते है. इन फाइव कोटा में प्री प्राइमरी कक्षा कोटा, स्टाफ कोटा, एल्यूमिनाई कोटा, सिबलिंग कोटा और मैनेजमेंट कोटा शामिल है. इन कोटा के बाद जो सीट बचता है, उस पर ही जेनरल बच्चों का नामांकन हो पाता है.
- सौ सीट के लिए दो हजार बिक जाते है आवेदन फाॅर्म हर स्कूल में नर्सरी में नामांकन के लिए सीट से कई गुणा अधिक नामांकन फार्म बिक जाते है. 5 जनवरी से 2016 के लिए नामांकन फार्म मिलना शुरू हुआ था. हर स्कूल अपनी सुविधा के अनुसार अभिभावकों को समय दिया है. कई एक दिन तो कई कहीं तीन से चार दिनों का भी समय नामांकन फार्म लेने के लिए दिया गया है. एक फार्म की कीमत स्कूलों ने मिनिमन पांच सौ रूपया रखा है. लेकिन नामांकन होगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है.
- सेलेक्शन नहीं रिजेक्शन करते है स्कूल कोटा के अंतर्गत आने वाले बच्चों को छोड़ दे तो बाकी बचे नामांकन फाॅर्म में सेलेक्शन नहीं रिजेक्शन किया जाता है. ऐसे में बच्चों के क्वालिटी या किसी और चीजों पर ध्यान नहीं दिया जाता है. बस स्कूल वाले देखते है कि काैन सा आधार बनायें जिससे नामांकन को रिजेक्ट कर दिया जायें. इसमें आवासीय प्रमाण पत्र, जन्म प्रमाण पत्र आदि को भी आधार बनाया जाता है. कई बार बच्चे के वजन कम होने पर भी बच्चे को छांट दिया जाता है. 

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