Rinku Jha
Sunday, February 21, 2016
गदर आंदोलन पर चली मिथिला की निब, बिहार से पहुंचा कनाडा
मिथिला पेंटिंग को अलग स्वरूप दे रही है पटना की अलका दास
संवाददाता, पटना
उन दिनों देश पर अंग्रेजों का शासन था. अंग्रेजों के शासन से बचने के लिए पंजाब के किसान कनाडा चले गये. वहां पर उन्हें भारतीय मजदूर बना कर कनाडा में रखा गया. जहाज से महीनों उन्हें कनाडा जाने में लगा. कनाडा में मजदूरी और शोषण से परेशान होकर लोग वापस देश आना चाहते थे, लेकिन उन्हें कनाडा से नहीं आने दिया जा रहा था. 1890 से 1910 ईश्वी तक चला गदर आंदोलन की शुरूआत लाला हरदयाल सिंह ने किया. गदर आंदोलन को अगर चित्रों से समझना अलका दास की पेंटिंग में आपको वो हर पहलू नजर आयेगा, जो अभी तक आपने किताबाें में पढ़ा होगा. बिहार की बेटी अलका दास ने पंजाब के किसान और उनकी मजबूरी को अपने निब से बखूबी बताया है. किस तरह किसान से अंग्रेजों से खेत छीना और वो कनाडा मे जाकर मजदूर बन गये. मिथिला पेंटिंग को एक अलग पहचान देने की कोशिश अलका दास कर रही है. 16 पेंटिंग के माध्यम से पूरा गदर आंदोलन को अलका दास ने बताने की कोशिश की है.
- मिथिला पेंटिंग ने लिया आंदोलन का स्वरूप
अभी तक मिथिला पेंटिंग में मिथिलांचल की सुगंध की मिलती रही है. सीता राम विवाह, कोबर और मिथिलांचल के आवोहवा ही मिथिला पेंटिंग की पहचान हुआ करती थी. लेकिन अब स्वतंत्रता संग्राम से लेकर पर्यावरण सुरक्षा में भी मिथिलांचल ने अपना जगह बनाना शुरू कर दिया है. अलका दास ने बताया कि वो मिथिला पेंटिंग में अलग-अलग टॉपिक पर काम कर रही है. इससे लोगों का रूझान मिथिला पेंटिंग पर अलग तरीके से हो रहा है. उन्होंने बताया कि मिथिला पेंटिंग में प्रयोग नहीं हुआ है, इससे इसकी मार्केटिंग सिमट सी गयी है. कुछ अलग करने की चाह ने उन्हें अलग टॉपिक पर काम करने का प्रेरणा दी है.
- सती प्रथा और दहेज को बनायेगी अपना मुददा
अलका दास का अब अगला टॉपिक देश में उन आंदोलन पर फोकस करना है जिसके कारण देश में आंदोलन की जरूरत पड़ी. इसमें सती प्रथा, बाल विवाह जैसे समाजिक कुरीतियों के विराेध में चले आंदोलन शामिल है. अलका दास ने बताया कि अभी देश में दहेज प्रथा काफी ज्वलंत मुददा है. दहेज प्रथा को खत्म करना जरूरी है. चित्रों के माध्यम से लोगों को खासकर मिथिलांचल वासी को अवेयर किया जायेगा.
- नेचुरल रंगों का करती है प्रयाेग
अलका दास मार्केट से रंग खरीद कर नहीं बल्कि खुद का भी रंग तैयार कर पेंटिंग काे अलग रंग देने की कोशिश करती है. गोबर और कोयला को मिला कर काला रंग तैयार करती है. तो गेंदा फूल से पीला रंग, सीम के पत्ते से हरा रंग और चुकंदर से पिंक रंग तैयार कर पेंटिंग में रंगों को भरती है. अलका दास ने बताया कि प्राकृतिक रंगों से पेंटिंग में प्राकृतिक खुशबू आती है.
- समाज के विरोध कर करना पड़ रहा सामना
रामायण, महाभारत और मिथिलांचल के रीति रिवाज को ही अब तक मिथिला पेंटिंग तक सीमित रखा गया है. ऐसे में जब अलका दास ने इसे आगे बढ़ाना चाहा तो उन्हें समाजिक विराेध का भी समाना करना पड़ा. अलका दास ने बताया कि हमारे समाज में आज भी मेरे पेंटिंग का विराेध होता है. लोगों का विरोध कर कहते है कि मिथिला पेंटिंग मिथिला तक ही होता है. सीता राम और उनसे जुड़े हुए चीजों तक ही मिथिला पेंटिंग काे माना जाता है. दूसरे टॉपिक पर मिथिला पेंटिंग को नहीं माना जायेगा.
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