Rinku Jha
Wednesday, February 3, 2016
नामांकन नहीं तो बंद कर दे पटना डेंटल कॉलेज
- बीसीइसीइ को सीट खत्म करने का इंडियन डेंटल एसोसिएशन ने दिया प्रस्ताव
रिंकू झा, पटना
जब स्टूडेंट ही नहीं तो कॉलेज का क्या मतलब बनता है. पिछले दो साल 2014 और 2015 सत्र के लिए पटना डेंटल कॉलेज में एक भी नामांकन नहीं हुआ. सीट पूरी तरह से वैकेंट है. ऐसे में कॉलेज को बंद कर दिया जाना ही बेहतर होगा. यह प्रस्ताव इंडियन डेंटल एसोसिएशन के बिहार चैप्टर की ओर से बिहार संयुक्त प्रतियोगिता परीक्षा पर्षद (बीसीइसीइ) की ओर से दिया गया है. शनिवार को एसोसिएशन की ओर से बीसीइसीइ और इंडियन डेंटल एसोसिएशन दोनों को एक पत्र लिख कर प्रस्ताव भेजा गया है. एसोसिएशन ने जहां बीसीइसीइ को सीट खत्म करने का प्रस्ताव दिया है, वहीं इंडियन डेंटल एसाेसिएशन को कॉलेज को बंद करने के बारे में कहा गया है.
- सीटें 80, नामांकन एक भी नहीं
बीसीइसीइ की ओर से लिये जाने वाले मेडिकल एंट्रांस में डेंटल कॉलेज में नामांकन के लिए 40 सीटें है. बिहार का एक मात्र पटना डेंटल कॉलेज ही है जहां पर डेंटल की पढ़ाई होती है. हर साल बीसीइसीइ की ओर से 40 सीटों पर नामांकन के लिए अभ्यर्थी को भेजा भी जाता है. लेकिन नामांकन नहीं लिया जा रहा है. अंत में अभ्यर्थी राज्य में या राज्य के बाहर चल रहे प्राइवेट डेंटल कॉलेज में नामांकन लेते है.
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कई गुणा अधिक पैसे होते है खर्च
पूर्व राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के ड्रीम प्रोजेक्ट के रूप में पटना डेंटल कॉलेज का स्थापना 1960 में किया गया था. 1990 तक कॉलेज में पढ़ाई के लिए फी मात्र छह सौ रूपये प्रति वर्ष के रूप में लिया जाता था. वर्तमान में 25 सौ रूपये प्रति वर्ष फीस के तौर पर लिया जाता है. वहीं प्राइवेट कॉलेजों में पांच से छह लाख रूपये प्रति वर्ष के रूप में छात्रों को देना पड़ता है. ज्ञात हो कि बिहार में अभी 9 प्राइवेट डेंटल कॉलेज चल रहे है. एक मात्र सरकारी पटना डेंटल कॉलेज होने के बावजूद नामांकन नहीं हो पा रहा है.
- इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं होने से नामांकन पर लगी है रोक
ना स्टूडेंट्स, ना शिक्षक, ना प्रिंसिपल तो कैसे चले कॉलेज. इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी के कारण इंडियन डेंटल एसोसिएशन की आेर से नामांकन पर रोक लगा दिया गया है. लेकिन बीसीइसीइ की ओर से हर साल 40 सीटें पटना डेंटल कॉलेज में नामांकन के लिए भेजा जाता है. एंट्रांस पास करने के बाद अभ्यर्थी को पता चलता है कि उनका नामांकन पटना डेंटल काॅलेज में नहीं होगा. वर्तमान में कॉलेज में मात्र तीन टीचर की कार्यरत है.
- करोड़ों का ग्रांट मिलता है कॉलेज को
1960 में खुले पटना डेंटल कॉलेज को चलाने में सरकार का हर साल करोड़ों का खर्च होता है. करोड़ों रूपये की मशीने बेकार पड़ी हुई है. पहले काॅलेज में फ्री इंटर्नशिप भी होता था. वर्तमान में पैसे लेकर इंटर्नशिप किया जाता है. पहले हमेशा तीन से चार सौ मरीज ओपीडी में रहते थे. अब इसकी संख्या 50 पर आकर रूक गयी है. अभी तक एक ही विषय में पीजी की पढ़ाई हो पा रही है.
- पलायन हो रहे छात्र
पटना डेंटल कॉलेज में नामांकन नहीं होने से बीसीइसीइ के पास आउट स्टूडेंट्स बिहार के बाहर नामांकन लेने को मजबूर होते है. हर साल सैकड़ों छात्र तमिलनाडू, कर्नाटका, उत्तर प्रदेश के प्राइवेट डेंटल कॉलेज में नामांकन लेते है. इससे कई गुणा अधिक पैसे देकर डिग्री लेते है.
कोट
पिछले दो सत्र से एक भी नामांकन कॉलेज में नहीं हुआ है. स्टूडेंट्स मजबूरी में प्राइवेट कॉलेज में नामांकन लेने काे मजबूर होते है. नामांकन नहीं होने से काॅलेज की मान्यता भी जा सकती है. बीसीइसीइ को हमने पत्र लिख कर प्रस्ताव दिया है कि डेंटल में नामांकन की सीट काे खत्म कर दे.
डा. अमलेश कुमार, सचिव, इंडियन डेंटल एसोसिएशन
हर साल सैकड़ों छात्र ऐसे होते है जो पटना डेंटल कॉलेज में नामांकन लेना चाहते है. लेकिन नामांकन नहीं हो पाता है. ऐसे में छात्रों को प्राइवेट कॉलेज की ओर जाना पड़ता है, जो काफी महंगा होता है. बिहार का टैलेंज बिहार के बाहर जाने का मजबूर है.
विपिन कुमार, डायरेक्टर, गोल इंस्टीच्यूट
पटना डेंटल कॉलेज में नामांकन नहीं होने से छात्रों को प्राइवेट कॉलेज में नामांकन लेना पड़ता है. ये मामले बीसीइसीइ के पास भी आता है, लेकिन हम उसमें कुछ नहीं कर सकते है. अभी प्रस्ताव हमारे पास आया नहीं है.
अनिल कुमार, ओएसडी, बीसीइसीइ
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