Sunday, September 13, 2015

सुनिता से अनिता होने में लग गये 21 साल

- अनिता कुमारी को अपने नाम और पिता के नाम को सुधवाने में लग गया 21 साल

रिंकू झा, पटनाइसे लापरवाही कहें या छात्रों के काम को नजरअंदाज करना कहें, लेकिन इसकी वजह से जो परेशानी छात्रों को उठानी पडती है, उसका खामियाजा तो उस छात्र को ही भरना पडता है. कई बार तो ऐसी लापरवाही से छात्र का पूरा कैरियर ही खत्म हो जाता है. कुछ ऐसा ही मामला बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के पास भी आया है. इंटर काउंसिल के कुछ कर्मचारियो की लापरवाही और नजरअंदाज करने के कारण अनिता कुमारी के नाम के सुधार में पूरा 21 साल लग गया. 1992-94 सत्र की अनिता कुमारी इंटर की परीक्षा तो अच्छे नंबर से पास कर गयी, लेकिन अनिता कुमारी के नाम और उनके पिता के नाम के स्पेलिंग में गलती हो गयी.
70 हजार रूपये खर्च करने के बाद नाम में हुआ सुधार डीसी इंटर कॉलेज, बरहरिया, सीवान की छात्रा अनिता कुमारी के सारे कागजाद में अनिता कुमारी नाम दर्ज था. लेकिन जब 2010 में अनिता कुमारी ने मूल प्रमाण पत्र के लिए अप्लाई किया तो मूल प्रमाण पत्र में अनिता कुमारी की जगह सुनिता कुमारी और पिता गौतम रावत की जगह जकन यादव हो गया था. इसके बाद मूल प्रमाण पत्र में सुधार करने के लिए अनिता कुमारी ने आवेदन दिया. केस काफी पुराना होने के कारण इसमें कोई भी काम नहीं करना चाहता था. कर्मचारियों ने इसे इग्नोर कर दिया. इसके बाद अनिता कुमारी लगातार इंटर काउंसिल का चक्कर लगाती रही. लेकिन इंटर काउंसिल के कर्मचारी उसे टालते रहे. इसके बाद अनिता कुमारी ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. अनिता कुमारी के पिता गौतम रावत ने बताया कि हाई कोर्ट ने भी इंटर काउंसिल को 2011 में चार महीने के अंदर मूल प्रमाण पत्र के साथ तमाम कागजाद सही करके देने का आदेश दिया. लेकिन हाई कोर्ट के आदेश को भी इंटर काउंसिल ने नहीं माना. गौतम रावत ने बताया कि एक नाम में सुधार करवाने में मुझे 70 हजार रूपये खर्च करने पड गये.
हाई कोर्ट के आदेश पर 30 अगस्त 2015 को मिला मूल प्रमाण पत्र गौतम रावन ने बताया कि हाई कोर्ट के आदेश के बाद इंटर काउंसिल ने पिता के नाम में ताे सुधार किया,लेकिन छात्रा के नाम में कोई सुधार नहीं किया. इसके बाद हम दुबारा इंटर काउंसिल दौडते रहे. कर्मचारी हमारी बातें मानते नहीं थथे.बार-बार कॉलेज से कागजाद लाने को बोलते रहे. हमने सारे कागजाद पहले ही काउंसिल में जमा कर दिया था. अंत में थक कर हम दुबारा हाई कोर्ट गये. इसके बाद 17 अगस्त 2015 को हाई कोर्ट ने समिति को आदेश दिया कि एक सप्ताह के अंदर छात्रा के मूल प्रमाण पत्र में नाम में सुधार कर छात्रा काे उपलब्ध करवायें. इसके बाद 30 अगस्त 2015 को हमें अनिता कुमारी का सही मूल प्रमाण पत्र प्राप्त हुआ है.
मूल प्रमाण पत्र मिलने पर गलती का पता चला अनिता कुमारी अगर अपने मूल प्रमाण पत्र लेने इंटर काउंसिल नहीं जाती तो गलती का पता भी नहीं चलता. इंटर काउंसिल के कर्मचारियों के द्वारा किये गये इस गलती का पता 16 सालों के पास अनिता कुमारी को पता चला. इसके बाद इसे सुधरवाने में पूरे पांच साल लग गये.
समिति ने तीन कर्मचारी को किया सस्पेंड अनिता कुमारी के नाम में सुधार नहीं करने और लापरवाही बरतने के कारण बाद में समिति ने तीन कर्मचारी प्रमोद सिंह, सुरेश गुप्ता, तुलसी रिषीदेव को सस्पेंड कर दिया. अनिता कुमारी को इंटर का मूल प्रमाण पत्र भी मिल गया, लेकिन इस सारे प्रकरण में अनिता कुमारी को 70 से 80 हजार रूपये खर्च करने पड़ गये.
कोटअनिता कुमारी के संबंध में जो भी कागजाद थे, समय पर ही काउंसिल को उपलब्ध करवा दिया गया था. मैट्रिक के साथ इंटर के नामांकन आदि का भी प्रमाण पत्र दे दिया गया था. लेकिन फिर भी इतना समय लग गया.
सुरेश प्रसाद यादव, पूर्व प्राचार्य, डीसी इंटर कॉलेज, बरहरिया, सीवान\\B

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