Sunday, November 15, 2015

भगवान भास्कर को साक्षात देख कर नजदीक होने का मिलता है अनुभव

संवाददाता, पटना

चार दिनों के उपवास के बाद जब उगते हुए सूर्य के दर्शन होते है, तो अजीब सी एनर्जी मिलती है. यह ऐसा एनर्जी होता है जो सालों भर कुछ भी करने से नहीं मिलता. चार दिनों के अनुष्ठान और लगातार 36 घंटे के व्रत का पता ही नहीं चलता है. पिछले 40 सालों से छठ व्रत कर रही डा. शांति राय ने बताया कि हर साल का छठ एक नया अनुभव देता है. छठ महापर्व के व्रत का अनुभव अद्भुत होता है.
20 सालों से गंगा नदी नहीं, घर पर ही करती हूं छठ गंगा नदी दूर होती जा रही है. वहीं छठ व्रतियों की भीड़ भी गंगा नदी में बढ़ती जा रही है. ऐसे में गंगा घाट पर जाने से पूजा कम, खुद को संभालना ही अधिक पड़ता है. भगवान सूर्य का दर्शन करना तक कठिन हो जाता है. डा. शांति राय की माने तो गंगा नदी में छठ व्रत करना बहुत कठिन होता है. डा. शांति राय ने बताया कि लगभग 20 साल पहले ही गंगा नदी पर जाना छोड़ दिया. अब घर पर ही छठ में सूर्य को अर्घ्य देती हूं. उन्होंने बताया कि 1990-91 के बीच एक्सीडेंट होने के कारण उस साल गंगा नदी में छठ करने पर रोक लगा दी गयी थी. इसके बाद से मै छठ अपने घर पर ही कर रही हूं.
चार दिनों में हर केस हो जाता सफल आम तौर पर डा. शांति राय छठ व्रत के दौरान पेंसेट को नहीं देखती है. लेकिन जब सीरियस केस आता है तो ऐसे पेसेंट को छाेड़ती भी नहीं है. बताती है डा. शांति राय कि चार दिन मै पूरी तरह से भगवान को समर्पित करती हूं. इस दौरान मै छुट्टी लेकर बस भगवान की आराधना में लगी रहती हूं. लेकिन जब भी इस दौरान कोई सीरियस पेंसेंट आता है तो उसका इलाज भी करती हूं. अपना अनुभव शेयर करते हुए डा. शांति राय ने बताया कि मैने अभी तक देखा है कि चार दिनों के अंदर जो भी पेंसेंट का इलाज किया, उसे केस बिलकुल ही सही रहा.
हर साल मिलता नया अनुभव छठ महापर्व का अनुभव हर साल डा. शांति राय के लिए नया होता है. वो बताती है कि हर साल का व्रत एक नया अनुभव देता है. चार दिनो के व्रत के बाद जब सूर्य का दर्शन होता है तो लगता है कि सारी मनोकामना पूरी हो गयी. चार दिन कैसे निकल जाते है पता ही नहीं चलता है. 1974 में पहली बार अपने छठ व्रत का अनुभव शेयर करते हुए डा. शांति बताती है कि पहली बार जब छठ किया तो पता ही नहीं चला और चार दिनों तक व्रत करते चली गयी.
ससुराल में शुरू किया छठ करना डा. शांति राय ने बताया कि बचपन से ही छठ पर्व देखती आयी थी. हर साल में छठ पर्व का इंतजार रहता था. लेकिन जब शादी हुई और ससुराल आयी तो ससुराल में छठ व्रत नहीं होता था. जब छठ महापर्व आता था तो मुझे काफी कमी खलती थी. हमेशा लगता रहता था कि कुछ कमी है. इसके बाद मैने खुद छठ महापर्व करना शुरू किया. 

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