Sunday, November 15, 2015

छठ महापर्व अब बिहार नहीं देश का हो गया पर्व

संवाददाता, पटना

छठ महापर्व पूरी तरह से हमारी आस्था से जुड़ा हुआ पर्व है. इसे महापर्व का नाम दिया गया है, क्याेंकि हर साल इस महापर्व से लाखाें लोग जुड़ते है. एक बार अगर कोई इस पर्व से जुड़ जायें तो उसकी आस्था इस पर्व से अटूट हो जाती है. चार दिनों के इस महापर्व में लोग इस तरह डूब जाते है कि बस हर तरफ आस्था ही आस्था नजर आती है. मेरे यहां पर छठ महापर्व नहीं होता है, लेकिन मै खुद को इससे जुड़ा हुआ महसूस करता हूं. बचपन से ही इस पर्व के प्रति काफी अास्था है. यह पर्व बिहार का पर्व है, लेकिन अब यह देश क्या विदेशों में भी होने लगा है. जहां पर भी बिहार के लोग है, अब धीरे-धीरे हर जगहों पर छठ महापर्व होने लगा है. बिहार के लोगों के साथ वहां के स्थानीय लोग भी इस पर्व से जुड़ने लगे है. एक बार मै नागालैंड और मिजोरम में था. वहां के लोगों को हिंदी नहीं आती थी, लेकिन छठ के प्रति ऐसी आस्था थी कि हर कोई सुबह में सूर्य के दर्शन काे नदी, तालाब पर पहुंच गया था. मुबंई में तो समुद्र किनारे छठ पर लाखों लोग भगवान भास्कर को अर्घ्य देते हैं. पूरी रात लोग घाट पर ही रहते है. दीपावली हो या दशहरा हो, इन पर्व में भगवान की पूजा घरों तक ही सीमित रहती है. लेकिन छठ का छटा, घर से लेकर बाहर तक दिखती है. जिस तरह की साफ सफाई छठ में दिखती है, वह किसी और पर्व में नहीं दिखती है. स्थानीय लोग खुद ही साफ सफाई करते है. छठ व्रती को भगवान का दर्जा दिया जाता है. घाट तक व्रती के पहुंचने कोई दिक्कतें ना हो, इसके लिए हर कोई एकजुट रहता है. अापसी प्रेम और भाईचारा जितना इस पर्व में दिखता है, उतना किसी और पर्व या त्योहार में नहीं दिखता है. हर जाति, धर्म के लोग इस पर्व से किसी ना किसी रूप से जुड़ जाते है. प्रकृति का एक अद्भुत रूप भी इस महापर्व में दिखता है. लंबे इंतजार के बाद जब उगते हुए सूर्य का दर्शन होता है तो आस्था और बढ़ जाती है.
अभय सिन्हा, रंगकर्मी \\B

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