Rinku Jha
Saturday, November 21, 2015
दो बार की फुटबाॅल चैम्पियन सोनी पढ़ाई और खेलने को दूसरे की हो रही मोहताज
- अंडर-13 नेशनल प्लेयर सोनी के पास ना घर है और ना ही पढ़ाने को पैसे
रिंकू झा, पटना
देश के लिए तो सोनी का एक गोल काफी होता है. खेल मैदान पर गोल कर उसने कई बार देश को नेशनल चैम्पियन बना डाला है. लेकिन आज सोनी अपने जीवन के गोल (लक्ष्य) में पिछड़ रही है. 2010 से फुटबाल खेल रही सोनी के पास ना तो घर है और ना ही पढ़ने के लिए समुचित व्यवस्था. 9वीं में पढ़ने के लिए उसे स्कूल से छात्रवृति मिलती है तो वहीं फुटबॉल की प्रैक्टिस कोच सुनील सर की मदद से करती है. घर का खर्च जैसे तैसे पिता के तांगे चला कर चल रहा है. सोनी को ऐसे मददगार की जरूरत है जिसकी थोड़ी से मदद से सोनी अपना इंटरनेशनल खिलाड़ी बनने का सपना पूरा कर सके.
2012 में बिहार सरकार ने किया था सम्मानित
सोनी का फुटबॉल ना सिर्फ हॉवी है बल्कि जु
नून है. जिसे वो इंटरनेशनल लेवल पर पहुंच सके. सोनी बस फुटबॉल के क्षेत्र में अपना नाम देश के साथ जोड़ना चाह रही है. 2012 में अंडर-13 के इंटरनेशनल फुटबाॅल मैच कोलंबो में हुआ था. इसमें पहले स्थान पर भारत और दूसरे स्थान पर इरान आया था. सोनी बताती है कि इस जीत के बाद जब वापस आयें तो बिहार सरकार की आेर से सम्मानित किया गया था. 11 हजार रुपये भी सरकार ने मुझे दिया. इसके बाद कोई मदद सरकार की ओर से नहीं हुआ है. सोनी ने बताया कि सभी मेरी गरीबी के बारे में पूछ कर चले जाते है. मदद के लिए कोई नहीं आता है.
छात्रवृति से खरीदी मोबाइल
सोनी ने बताया कि उसके पास मोबाइल नहीं था. इससे उसे काफी दिक्कतें होती थी. जब 9वीं क्लास में आयी तो छात्रवृति मिली. इस छात्रवृति से एक मोबाइल लिया और छोटी बहन के लिए किताबें खरीदी. भाई के लिए स्कूल बैग खरीदा. अब अगले साल छात्रवृति के पैसे मिलेंगे तो भाई और बहन को प्राइवेट स्कूल में एडमिशन करवायेगी. जिससे उनकी पढ़ाई अच्छी से हो सकेगा.
2015 में किया था कैप्टन के रूप में प्रतिनिधित्व
सोनी अंडर-13 के लिए खेलती है. अभी तक तीन बार देश का प्रतिनिधित्व कर चुकी है. अंडर-13 के लिए 2012 और 2013 में लगातार दो साल भारत चैम्पियन भी रहा है. काेलंबो श्रीलंका में खेला गया यह दोनो इंटरनेशनल मैच में भारत प्रथम स्थान पर रहा है. इसके बार 2015 में अंडर-13 की मैच काठमांडू नेपाल में खेला गया. लेकिन भूकंप आने के कारण मैच बीच में स्थगित कर देना पड़ा. सोनी ने बताया कि जीत कर जब आते है तो काफी सम्मान मिलता है. लेकिन हमारी गरीबी पर कोई कुछ नहीं करता है. मुझे मेरे कोच सुनील वर्मा काफी मदद करते है. अगर वो नहीं होते तो मै आज यहां तक नहीं पहुंचती.
कोट
मै ही सोनी के पढ़ाई से लेकर सारा खर्च उठाता हूं. हर महीने तीन हजार के लगभग मैं सोनी पर खर्च करता हूं. उसके पास इतने पैसे नहीं है जो वो अपनी पढ़ाई कर सके. इस बच्ची में फुटबाल का जुनून मैने देखा. इस कारण मैने इसे मदद करने लगा. आज ये बच्ची देश का नाम रौशन कर रही है. लेकिन गरीबी इतनी है कि आगे बढ़ने में काफी दिक्कतें हो रही है.
सुनील वर्मा, सोनी के कोच
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