Rinku Jha
Sunday, April 3, 2016
बहन ने दिया साथ, तभी छोड़ पाया शराब
- विवेक मोहन चतुर्वेदी की कहानी का दूसरा अंक
संवाददाता, पटना
हितैशी हैप्नीनेस के पास मुझे डाल दिया गया. तीन दिनों तक तो मुझे पता ही नहीं चला कि मुझे शराब छुड़ाने वाले संस्था के छोड़ा गया है. शुरूआत में तीन दिनो तक मुझे दवा देकर सुला कर रखा जाता था. क्याेकि जब नींद खुलती थी तो मै खुद का हाथ काट लेता था. सारा सामान फेंक देता था. नवंबर 2013 में मुझे हितैसी में भरती करवाया गया. एक सप्ताह तक मै काफी एग्रेसिव रहता था. लेकिन दवा और काउंसिलिंग ने मुझे काफी फायदा दिया. मेरे हितैशी मै आने के एक सप्ताह बाद ही मुझे बेटा हुआ. पत्नी मेरी जमशेदपुर में थी. हमारे बीच तलाक होने की बात आ रही थी. मेरी काउंसिलिंग हर दिन पुष्पीता मैम करती थीं. पुष्पीता मैम ने मुझे मेरे बेटे होने की खबर दी. कहा कि तुम तो अपने पिता को खुशी नहीं दे पायें, क्या तुम चाहते हो कि तुम्हारा बेटा भी तुम्हारे जैसा बने. पुष्पीता मैम हमेशा मुझे मेरे पिता और बेटे के उपर फोकस करती रही. इसका मेरे दिमाग पर बहुत असर हुआ. यहां पर मै चार से पांच महीने रहा. इस बीच मैने एक बार भी शराब नहीं पीया. दिमाग में कई बातें आती थी. अकेले में खूब रोता था. मुझे योगा करवाया जाता था. भगवान के भजन सुनाये जाते थे. धीरे-धीरे मेरा दिमाग शांत होने लगा. गुस्सा कम आने लगा. मुझे अपने परिवार की याद आने लगी. बहन और जीजाजी मिलने आते थे. वंदना दीदी का चेहरा देखता तो काफी सूकून मिलता था. चार पांच महीने के बाद दीदी मुझे लेकर घर चली अायी. डाक्टर और काउंसलर ने मुझे और रहने की सलाह दिया. मै जब आ रहा था तो डाक्टर ने कहा कि यह बाहर जाकर फिर शराब पीने लगेगा. अगले एक महीने के अंदर यह दुबारा यहां पर भरती होगा. लेकिन मेरी दीदी के अंदर ऐसा विश्वास था कि वो मुझे घर ले आयी. घर पर मै एक साल तक अकेले ऐसे ही बैठा रहा. अब मेरे पास मेरी नयी जिंदगी की एक चुनौती थी. इस चुनौती काे मुझे खुद सामना करना था. मेरे पास कुछ नहीं बचा था. यहीं से मुझे अपने लिए रास्ता निकाला था.... क्रमश:
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