Sunday, April 3, 2016

एक ही अफसोस.... पापा का अंतिम संस्कार तक नहीं पाया


- शराब छोड़ने के बाद बस रह जाता है अफसोस
संवाददाता, पटनाकहते है जो बीत जाता है वह वापस नहीं आता. अगर सही किया तो पीछे की लाइफ को सोच कर खुशी मिलती है, अगर गलत किया तो एक अफसोस रह जाता है. कुछ ऐसे ही अफसोस भरी जिंदगी उन शराब पीने वालों की होती है जो शराब के नशे में क्या कर जाते है, इसका उन्हें पता तक नहीं होता है. अपनी जिंदगी तो बर्बाद करते ही है, साथ में उनका पूरा परिवार भी तबाह हो जाता है. लेकिन उन्हें इसका अफसोस तब होता है जब वो नशे से बाहर आते है. हम आपके पास ऐसे ही शख्स की कहानी रखेंगे. जिसे शराब की बुरी लत लगी थी. शराब ही उनकी जिंदगी थी. शराब का ऐसा नशा था कि पत्नी छोड़ कर चली गयी. बहन ने नाता तोड़ लिया. पिता को लीवर कैंसर था. लेकिन शराब के नशे में उन्हें इसकी जानकारी तक नहीं हुई. अंत में पिता दुनियां छोड़ गये. अंतिम संस्कार तक वो पिता का शराब के नशे के कारण नहीं कर पाया... बाद में इसका अफसोस हुआ. खुद को शराब की नशे से बाहर किया. इसके लिए पूरा दो साल मेहनत भी किया. आज वो दुबारा अपनी जिंदगी शुरू कर चुके है. खाजपुरा में कपड़े का अपना शो रूम खोला है. पूरा परिवार को साथ लेकर चल रहे है. लेकिन उन्हें आज भी इस बात का काफी अफसोस है कि जिंदगी भर पिता को दुख देता रहा. और जब पिता दुनिया छोड़ गये, तब अंतिम संस्कार तक नहीं कर पाया. इस शख्स का नाम विवेक मोहन चतुर्वेदी है. कदमकुंआ के विवेक माेहन चतुर्वेदी अब दूसरों को शराब नहीं पीने काे लेकर मोटिवेट करते है. विवेक मोहन के पिता मदन मोहन चतुर्वेदी पटना हाई कोर्ट में वकील थे. मां गायत्री चतुर्वेदी भी पटना हाई कोर्ट में वकील है. एक बहन वंदना प्रकाश है. अब विवेक अपना पूरा ध्यान अपने बिजनेस में लगा रहे है. जहां दूसरे लोग मीडिया के पास अपना नाम छुपा कर अपनी शराब पीने की कहानी बयां करते है. वहीं विवेक मोहन खुद अपनी कहानी लोगों के सामने रखना चाह रहे है जिससे उन लोगों को सबक मिले जो शराब को छोड़ नहीं पा रहे है. विवेक मोहन चतुर्वेदी की कहानी हम तीन सीरीज में पेश करेंगे... इसकी पहली कड़ी विवेक मोहन की ही जुबानी...
पापा का अंतिम संस्कार करना था, घाट पर बहन से किया मारपीट मै घर में अकेला हूं. इस कारण बचपन से ही काफी दुलार प्यार में पला बढ़ा. जो कहता था मेरी मांग तुरंत पूरी की जाती थी. 1998 में डीएवी खगौल से 10वीं बोर्ड फर्स्ट डिवीजन से पास किया. काफी अच्छे मार्क्स आयें. चुकी पापा की भी स्टडी कोलकाता से हुई थी. इस कारण मै भी आगे की पढ़ाई के लिए कोलकाता चला गया. 12वीं बोर्ड कोलकाता से ही किया. पेइंग गेस्ट के तौर पर मै रहता था. मै चुकी सीए बनना चाहता था. इस कारण कॉमर्स से ग्रेजुएशन करने के साथ-साथ सीए की भी तैयारी करता था. सीए के लिए 2001 में फाउंडेशन कोर्स भी मैने पास किया. कोलकाता में रहते हुए मेरे कुछ दोस्त बन गये थे. इन्हीं चार पांच दोस्त मिलकर किराये के मकान में रहने लगे. अभी तक सारा कुछ ठीक था. दोस्तों के साथ रहते हुए कई बार बर्थडे आदि पर ओकेजनली ड्रींक पीने लगा. जिस मकान में रहता था, वहां पर एक लड़की के साथ मेरा अफेयर भी चलने लगा. इस बीच 2002 में ग्रेजुएशन फर्स्ट ईयर की परीक्षा थी. मेरा रिजल्ट खराब हो गया. इसके बाद मै डिप्रेशन में रहने लगा. डिप्रेशन से बचने के लिए लगातार ड्रींक लेने लगा. अब तक मेरी आदत की जानकारी फैमिली को हो गयी थी. पाता मां कोलकाता आ गये. फैमिली के डर से मैने शराब की जगह स्लीपिंग प्लिस दवा लेना शुरू कर दिया. एक दिन में 20 से 25 स्लीपिंग प्लिस लेता था. फिर पापा ने मुझे उस किराये के मकान से हटा कर फिर पेइंग गेस्ट म शिफ्ट कर दिया. कोलकाता के सॉकलेक सिटी इलाके में पेइंग गेस्ट के तौर पर रहने लगा. वहां पर मेरा शिवम नाम का लड़का रहता था. शिवम के सलाह पर मै खांसी की दवा कोरेक्स लेने लगा. एक दिन में मै तीन चार बोतल कारेक्स की पी जाता था. छह महीने तक मै यह लेता रहा. इससे खाना पीना काफी कम हो गया. इससे मेरे पेनक्रियाज में प्राब्लम हो गया. एक दिन तबीयत खराब होने से 2.30 बजे रात में मुझे हास्पीटल में भरती होना पड़ा. मेरी स्थिति देखकर पापा मुझे पढ़ाई छुड़ा कर पटना ले लायें. 2004 में मै पटना आ गया. एक साल तक मै पटना में रहा. पटना में नये सिरे से पढ़ाई शुरू किया. आरपीएम कॉलेज में 2005 में ग्रेजुएशन में नामांकन लिया. काफी अकेलापन हो गया था. तो सोचा पढ़ाई के साथ-साथ नौकरी भी करूं. कई जगह कोशिश करने के बाद 2006 में सोनी कंपनी में मुझे सेल्स मैन की नौकरी मिली. नौकरी के सिलसिले में मुझे कई बार बाहर भी जाना पड़ता था. यहां पर भी दोस्तों का ड्रींक पीने का माहौल मिल गया. दोस्तों के जबरदस्ती करने पर मै फिर से ड्रींक लेने लगा. अब मै शराब के साथ स्लीपिंग प्लिस, कोरेक्स और गाजा का भी आदी हो गया था. मेरे इस नशे की जानकारी फैमिली को 2009 में पता चल गया. पापा ने कुछ नहीं कहा, बस समझाया कि ऐसे में मेरा शरीर खराब हो जायेगा. फिर 2011 में मेरा जॉब छूट गया. इसके बाद मैने अपना बिजनेस शुरू किया. 2012 फरवरी में मेरी शादी कर दी गयी. शादी के बाद पत्नी को पता चला. शराब के नशे में पत्नी को काफी पीटता था. एक दिन वो भी मुझे छोड़ कर चली गयी. इस बीच पता चला कि पापा को लीवर कैंसर है. मै घर में बैठ का मां का जेवर चुरा कर बेच कर शराब पीता था. और मेरी मां अकेले पापा को कभी दिल्ली तो कभी लखनउ में इलाज करवाने ले जाती थी. अंत में नवंबर 2013 में पाता का निधन लखनऊ में हो गया. फिर मेरे जीजाजी मुझे लेकर बनारस गये. बनारस में ही पापा का अंतिम संस्कार होना था. मै अंतिम संस्कार के समय पर भी काफी नशे में था. मेरी बहन ने कुछ कह दिया. इसके बाद घाट पर ही बहन से खूब लड़ाई किया. उसके साथ मारपीट तक कर लिया. शराब के नशे में मै काफी गुस्से में हो जाता था. घाट पर जैसे तैसे मुझे लोग पटना लेकर आयें. मेरी नशे में होने के कारण पापा का 13वीं तक नहीं हुआ. आर्य समाज के अनुसार तीन दिनों में ही सारा काम समाप्त कर दिया गया. नशे में मै इतना गुस्सा में था कि एक दिन घर में ही आग लगाने लगा. फिर फैमिली वालों ने मुझे हितैसी हैप्पीनेस नशा विमुक्ति केंद्र में भरती करवा दिया....
विवेक मोहन चतुर्वेदी, कदमकुंआ \\B

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