Friday, April 8, 2016

सारे नियम ताक पर, सामान ढ़ाेेने वाले ऑटो में स्कूल जाते है बच्चे

ऑटो और वैन में ठूसे जाते है बच्चे

संवाददाता, पटनायहां तो नियम ही बनते है तोड़ने के लिए. खासकर अगर स्कूल की बात हो तो प्रशासन भले नियम बना दे, लेकिन स्कूल वाले उसे माने यह अनिवार्य नहीं होता है. सारे नियम को ताक पर रख कर स्कूल प्रशासन अपनी मरजी से स्कूल नियम का पालन करते है. अभी तक ताे सड़क पर ऑटो में बच्चे ठूसे हुए ही स्कूल आते और जाते नजर आते थे. लेकिन अब ताे समान ढोने वाले ऑटो में भी बच्चे स्कूल आते है. दीघा स्थित सरस्वती एकेडमी, बाघ कोठी के बच्चे हर दिन समान ढोने वाले ऑटो में स्कूल आते-जाते है. खुले ऑटो में बीच में एक तखत रखा हुआ है, इसी तखत पर बच्चे बैठे रहते है. छात्र आदित्य ने बताया कि हम लोग हर दिन ऐसे ही स्कूल जाते है और घर आते है. घर से स्कूल दूर है, इस कारण इसमें बैठे कर जाते है.
- तीन की जगह छह बैठाते है ऑटो में छोटे ऑटो में तीन और बड़े ऑटो यानी विक्रम छह बच्चे को बैठाया जाना है. लेकिन इस नियम का पालन नहीं होता है. जहां छोटे ऑटाे में तीन की जगह पांच (तीन पीछे और दो आगे ड्राइवर के बगल में) बच्चे को ऑटो वाले बैठाते है. वहीं विक्रम वाले ऑटो में छह की 12 बच्चे बैठे हुए नजर आते है. छह बच्चे बीच में और पीछे तीन या चार बच्चे को बैठाया जाता है. वहीं ड्राइवर के बगल में तीन बच्चे बैठे होते है. कई आॅटो में तो इससे भी अधिक बच्चे बैठे रहते है.
- कभी भी हो सकती है हादसा इस तरह आॅटो के उपर बच्चे का बैठना खतरे से खाली नहीं है. कभी भी हादसा हो सकती है. लेकिन इसकी चिंता ना तो स्कूल प्रशासन को है और ना ही अभिभावकों को. कई बार ट्रैफिक पुलिस की ओर से कुछ नियम बनाये भी गये तो उसे फाॅलो नहीं किया जा रहा है. कई ऑटो में तो बच्चे लटके हुए नजर आते है.
- भाड़ा बढ़ा कर, ठूसते है बच्चों को ऑटो के अलावा बस में भी स्टूडेंट्स खड़े हो कर घर आते जाते है. कई स्कूलों में सीट के मुताबिक बच्चे को बैठाना का नियम बना भी है. बस वालों को नियम फॉलो करने के लिए भी कहा गया है. बस वाले इसे लागू करते भी है, लेकिन साथ में भाड़ा भी बढ़ा देते है. कुछ दिनों के बाद भाड़ा तो वही रहता है, लेकिन बच्चों को सीटें मिलना बंद हो जाता है. क्योंकि बस वाले फिर सीट से अधिक बच्चे को ढोने लगते है. 

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