दूसरों के लिए जीना ही तो जीना है
- दोनों पांव से विकलांग प्रो. सतीश, पर शिक्षक की मिसाल कर रहे पेश
- खुद पर डिपेंड प्रो. सतीश बन रहे दूसरों के मददगार
संवाददाता, पटना
भगवान जब भी किसी स्पेशल इंसान को पैदा करता है तो उसके अंदर एक जज्बात और हिम्मत इतना दे देता है कि वो फिर आगे की बढ़ता जाता है. पीछे मुड़ कर नहीं देखता है. कुछ ऐसी ही सोच के है प्रो. सतीश कुमार. पटना विवि के इतिहास विभाग मे लेर के पद पर आसीन प्रो. सतीश कुमार अपने दोनों ही पांव से विकलांग है. बचपन से लेकर अभी तक कभी भी वो किसी पर डिपेंड नहीं रहें. हमेशा खुद आगे बढ़ते गये. कभी किसी की मदद नहीं ली, बस जो सोचा वो किया और अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते चले गये. प्रो. सतीश की मजबूरी कभी उनकी सफलता में रूकावट नहीं बना. शिक्षक दिवस पर प्रो.सतीश ने अपनी जिंदगी की कई चीजों को हमने शेयर किया.
- निराशा से नहीं आशा से बढ़ते गये आगे
निराशा कभी उन्हें छू नहीं पायी. हर मुश्किलों का सामना उन्होंने आशावादी बन कर किया. हाई स्कूल तक की पढ़ाई गांव में किया. इंटर से एमए तक की पढ़ाई मुजफ्फरपुर से करने के बाद वो पटना आ गये. प्रो. सतीश ने बताया कि परिवार की स्थिति सही नहीं थी. इस कारण मुङो अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए ट्यूशन करना पड़ा. मै घरों में जाकर ट्यूशन करता था. उससे जो पैसे मिलते थे. उससे अपनी पढ़ाई पूरी करता रहा. सरकार की ओर से विकलांगों को मिलने वाली सुविधाओं से अंजान प्रो. सतीश को कभी भी कोई अधिकार नहीं मिला.
- एक अच्छा इंसान पैदा करने का है मिशन
प्रो. सतीश की इच्छा प्रशासनिक सेवा में जाने का था. उन्होंने सिविल सर्विसेज की तैयारी भी की थी. लेकिन सफलता नहीं मिली. लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. अपना लक्ष्य शिक्षण कार्य की ओर ले कर बढ़े. 10 सालों से पटना विवि में इतिहास के शिक्षक के रूप मे कार्यरत प्रो. सतीश ने बताया कि इस ओर आने का मेरा मकसद अपने हर बैच से अधिक से अधिक अच्छा इंसान पैदा करना है. आज हमारे समाज में सबसे अधिक वैेंकेंसी अच्छे इंसान की है. ऐसे में मेरा मिशन यहीं है कि हर साल अपने बैच से अच्छा इंसान बनाने में मदद करूं.
- दोस्त विगन राम का समर्पण आज भी है याद
मेरी सफलता के पीछे मेरा बचपन का दोस्त विगन राम का विशेष योगदान रहा है. आज मुङो वो बहुत ही याद आ रहा है. मेरा गांव बाढ़ ग्रस्त इलाके में आता है. इससे बरसात के दिनों में मेरा स्कूल जाना मुश्किल हो जाता था. ऐसे में मेरा दोस्त विगन राम मुङो अपनी साइकिल पर बैठा स्कूल ले जाता था. एक दिन बाढ़ का पानी अधिक होने के कारण सड़क कट गया था. ऐसे में साइकिल भी जाने का रास्ता बंद हो गया. हम लोग स्कूल से लौट रहे थे. हम तीन लोग थे. मै साइकिल की पीछे कैरियर पर बैठा था. मैने उनके साइकिल से उतर कर पानी तैर कर पार करने को कहा. लेकिन उन दोंनों से मुङो साइकिल से उतरने नहीं दिया. मेरा दोस्त विगन राम खुाद पीठ के बल लेट गया और उस पर से दूसरा दोस्त साइकिल को पार किया. आज भी मुङो वह दिन याद आता है तो रोंगटे खड़े हो जाते है. यह पल आज भी मेरी जिंदगी का सबसे अच्छा पल है.
- 9 से 10 घंटे गुजरती है किताबो की बीच
प्रो. सतीश का हर दिन का दिनचर्या सुबह पढ़ाई से शुरू होता है और रात में पढ़ाई से समाप्त होता है. हर दिन प्रो. सतीश 9 से 10 घंटें की पढ़ाई करते है. उन्होंने बताया कि सुबह तीन घंटे मै पढ़ कर ही घर से निकलता हूं. मै बिना पढ़े नहीं रह सकता हूं. इस कारण सुबह, दिन में और रात में भी तीन घंटें की पढ़ाई करता हूं. इसमें इतिहास के साथ साहित्य की पुस्तकें भी शामिल होते है. शिक्षक दिवस को लेकर प्रो. सतीश ने बताया कि आज शिक्षक की महता गिरती जा रही है. समाज में विद्वान शिक्षकों की कमी नहीं है. लेकिन आज इज्जत कम होती जा रही है. मेरा सपना है कि शिक्षकों के इस कमी को पूरा करें.
3 september 2014 prabhat khabar
- दोनों पांव से विकलांग प्रो. सतीश, पर शिक्षक की मिसाल कर रहे पेश
- खुद पर डिपेंड प्रो. सतीश बन रहे दूसरों के मददगार
संवाददाता, पटना
भगवान जब भी किसी स्पेशल इंसान को पैदा करता है तो उसके अंदर एक जज्बात और हिम्मत इतना दे देता है कि वो फिर आगे की बढ़ता जाता है. पीछे मुड़ कर नहीं देखता है. कुछ ऐसी ही सोच के है प्रो. सतीश कुमार. पटना विवि के इतिहास विभाग मे लेर के पद पर आसीन प्रो. सतीश कुमार अपने दोनों ही पांव से विकलांग है. बचपन से लेकर अभी तक कभी भी वो किसी पर डिपेंड नहीं रहें. हमेशा खुद आगे बढ़ते गये. कभी किसी की मदद नहीं ली, बस जो सोचा वो किया और अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते चले गये. प्रो. सतीश की मजबूरी कभी उनकी सफलता में रूकावट नहीं बना. शिक्षक दिवस पर प्रो.सतीश ने अपनी जिंदगी की कई चीजों को हमने शेयर किया.
- निराशा से नहीं आशा से बढ़ते गये आगे
निराशा कभी उन्हें छू नहीं पायी. हर मुश्किलों का सामना उन्होंने आशावादी बन कर किया. हाई स्कूल तक की पढ़ाई गांव में किया. इंटर से एमए तक की पढ़ाई मुजफ्फरपुर से करने के बाद वो पटना आ गये. प्रो. सतीश ने बताया कि परिवार की स्थिति सही नहीं थी. इस कारण मुङो अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए ट्यूशन करना पड़ा. मै घरों में जाकर ट्यूशन करता था. उससे जो पैसे मिलते थे. उससे अपनी पढ़ाई पूरी करता रहा. सरकार की ओर से विकलांगों को मिलने वाली सुविधाओं से अंजान प्रो. सतीश को कभी भी कोई अधिकार नहीं मिला.
- एक अच्छा इंसान पैदा करने का है मिशन
प्रो. सतीश की इच्छा प्रशासनिक सेवा में जाने का था. उन्होंने सिविल सर्विसेज की तैयारी भी की थी. लेकिन सफलता नहीं मिली. लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. अपना लक्ष्य शिक्षण कार्य की ओर ले कर बढ़े. 10 सालों से पटना विवि में इतिहास के शिक्षक के रूप मे कार्यरत प्रो. सतीश ने बताया कि इस ओर आने का मेरा मकसद अपने हर बैच से अधिक से अधिक अच्छा इंसान पैदा करना है. आज हमारे समाज में सबसे अधिक वैेंकेंसी अच्छे इंसान की है. ऐसे में मेरा मिशन यहीं है कि हर साल अपने बैच से अच्छा इंसान बनाने में मदद करूं.
- दोस्त विगन राम का समर्पण आज भी है याद
मेरी सफलता के पीछे मेरा बचपन का दोस्त विगन राम का विशेष योगदान रहा है. आज मुङो वो बहुत ही याद आ रहा है. मेरा गांव बाढ़ ग्रस्त इलाके में आता है. इससे बरसात के दिनों में मेरा स्कूल जाना मुश्किल हो जाता था. ऐसे में मेरा दोस्त विगन राम मुङो अपनी साइकिल पर बैठा स्कूल ले जाता था. एक दिन बाढ़ का पानी अधिक होने के कारण सड़क कट गया था. ऐसे में साइकिल भी जाने का रास्ता बंद हो गया. हम लोग स्कूल से लौट रहे थे. हम तीन लोग थे. मै साइकिल की पीछे कैरियर पर बैठा था. मैने उनके साइकिल से उतर कर पानी तैर कर पार करने को कहा. लेकिन उन दोंनों से मुङो साइकिल से उतरने नहीं दिया. मेरा दोस्त विगन राम खुाद पीठ के बल लेट गया और उस पर से दूसरा दोस्त साइकिल को पार किया. आज भी मुङो वह दिन याद आता है तो रोंगटे खड़े हो जाते है. यह पल आज भी मेरी जिंदगी का सबसे अच्छा पल है.
- 9 से 10 घंटे गुजरती है किताबो की बीच
प्रो. सतीश का हर दिन का दिनचर्या सुबह पढ़ाई से शुरू होता है और रात में पढ़ाई से समाप्त होता है. हर दिन प्रो. सतीश 9 से 10 घंटें की पढ़ाई करते है. उन्होंने बताया कि सुबह तीन घंटे मै पढ़ कर ही घर से निकलता हूं. मै बिना पढ़े नहीं रह सकता हूं. इस कारण सुबह, दिन में और रात में भी तीन घंटें की पढ़ाई करता हूं. इसमें इतिहास के साथ साहित्य की पुस्तकें भी शामिल होते है. शिक्षक दिवस को लेकर प्रो. सतीश ने बताया कि आज शिक्षक की महता गिरती जा रही है. समाज में विद्वान शिक्षकों की कमी नहीं है. लेकिन आज इज्जत कम होती जा रही है. मेरा सपना है कि शिक्षकों के इस कमी को पूरा करें.
3 september 2014 prabhat khabar
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