Tuesday, January 12, 2016

स्कूली बसों की सुरक्षा की होती है बस बातें, ना स्कूली बस सेफ और ना ही बच्चे

- सड़क सुरक्षा सप्ताह में भी स्कूली बच्चे नहीं है सेफ

संवाददाता, पटनाइन दिनों सड़क सुरक्षा सप्ताह चल रहा है. हर तरफ अवेयरनेस की बातें हो रही है. जिला प्रशासन से लेकर ट्रैफिक पुलिस तक स्कूली बच्चों के सुरक्षा को लेकर अभियान चलाये जा रहे है. पंपलेट बांटे जा रहे है. पंपलेट के माध्यम से स्कूली बच्चों को बस में बैठने के तरीके बताये जा रहे है. सुरक्षा की बस बातें हो रही है, हकीकत कुछ और है. पंपलेट में जितनी भी बातों के प्रति अवेयर किया जा रहा है, वो सारे के सारे बस कागजों तक ही सीमित है. ना तो उसका पालन पहले कभी हुआ और ना ही अभी सड़क सुरक्षा के दौरान हो रहा है.
अवेयर - स्कूल बस में बैठने में जल्दबाजी ना करें हकीकत - स्कूल की बस स्कूल कैंपस के बाद सरकती रहती है. सरकती हुई बस में स्कूली बस में बच्चे बैठते है
अवेयर - एक कतार में रहकर बस में प्रवेश करें हकीकत - कंडक्टर बच्चे को कतार में लगने देंगे तभी तो. जल्दी-जल्दी बच्चों को पकड़ कर बस में बैठाया जाता है
अवेयर - रेलिंग पकड़कर बस में प्रवेश करें हकीकत - बस में रेलिंग रहती कहां है. दरवाजा पकड़ कर ही बच्चे बस में प्रवेश करते है
अवेयर - देख ले कि आपका बैग या कपड़े आदि कहीं भी ना फंसे हकीकत - स्कूली बस में जगह-जगह जंग लगा रहता है. ऐसे में आये दिन बच्चे के बैग और यूनिफार्म फट जाते है. कई बार तो हाथ या पैर में भी लोहे से कट जाता है
अवेयर - सीधे अपनी सीट पर जाकर बैठ जायें हकीकत - सीट मिले तभी ना बैठेंगे. आधे से अधिक बच्चे तो बस में खड़े ही रहते है
अवेयर - बस में चेहरा सामने की ओर रखें हकीकत - बच्चे बस के अंदर क्या कर रहे है, उन्हें देखने वाला कोई नहीं होता है. अधिकांश स्कूली बसों मे बच्चों का हाथ खिड़की के बाहर निकला हुआ रहता है
अवेयर - बस से उतरते समय बस के रूकने का इंतजार करें हकीकत - बस स्टॉपेज के अलावा भी बस बार-बार रूकती है. बस के रूकने के पहले ही बच्चे को गेट पर आने को कहा जाता है. इससे अचानक ब्रेक लगाने से बच्चे कई बार गिर भी जाते है

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